हम अपने डॉक्टर कैसे बने ? Health Series Post 2 of 100
हम अपने डॉक्टर कैसे बने ?
हमारे देश के आयुर्वेदाचार्य महर्शि चरक, निघट्टू बाग्भट्ट, सुघात, पाराषर ऋशि आदि ने एक ही बात मिलकर कही है कि स्वयं व्यक्ति अपनी हर बीमारी का सबसे अच्छा डॉक्टर हो सकता है। क्यों कि वह अपने दुःख तकलीफ का जितनी गहराई से महसूस कर सकता है इसे कोई डॉक्टर भी नहीं कर सकता। वह जितनी गहराई से अपने दुःख को जानता है इसलिए वह स्वयं का डाक्टर हो सकता है उसको कुछ ज्ञान की जरूरत नहीं है और कुछ ज्ञान से वह हर प्रकार की बीमारी से लड़ सकता है और दूसरों की मदद कर सकता है। आयुर्वेद के पंण्डित भी इस बात को मानते हैं वह कहते हैं कि षरीर का 85 प्रतिषत हिस्सा इतना सरल और आसान है कि इसका इलाज आप खुद कर सकते हैं। मात्र 15 प्रतिषत षरीर का हिस्सा ऐसा है कि जिस में आपको किसी विषेशज्ञ की जरूरत पड़ सकती है। यहॉ यह कहना उचित है कि 15 प्रतिषत हिस्से वाले भाग में बहुत कम बीमारियॉ हैं। और 85 प्रतिषत जिसे आप जानते हैं उसमें बीमारी बहुत अधिक हैं।
85 प्रतिषत हिस्से में वाग्भट्ट जी कहते हैं अपने षरीर को जान लीजिये भोजन को पहचान लीजिए इससे आप स्वयं के 100 प्रतिषत डॉक्टर हैं। थोड़े षरीर के अंगों का ज्ञान हो, अंग उपांग हृदय, लिवर किडनी आदि की षरीर में स्थिति एक अंग
का दूसरे अंग से सम्बन्ध।
वाग्भट्ट जी कहते हैं कि जिसने भोजन को जान लिया रसोई को पहचान लिया, उसे कभी भी चिकित्सक की जरूरत नहीं पडेगी। जीवन की सबसे बडी विज्ञान रसोईघर है। भोजन विज्ञान अथवा पाक षास्त्र, कला विज्ञान।
वाग्भट्ट जी का सूत्र है कि भोजन को बनाते समय सूर्य का प्रकाष- पवन का स्पर्ष जरूरी है। वह भोजन कभी नहीं करना जो विश है। विश दो प्रकार का होता है। एक वो जो तत्काल असर करता है दूसरा वो विश है जो धीरे-धीरे असर करता है। ैसवू चवपेवद धीरे-धीरे आपको मारेगा। यहॉ हम रसोई घर का वर्णन करेंगे।
इस तरह की और भी जानकारी के लिये हमारे साथ जुडे रहये। हम आप के साथ और भी स्वस्थ सम्बन्धी जानकारी व उनके उपचार भी साझा करेंगे।
हमारे देश के आयुर्वेदाचार्य महर्शि चरक, निघट्टू बाग्भट्ट, सुघात, पाराषर ऋशि आदि ने एक ही बात मिलकर कही है कि स्वयं व्यक्ति अपनी हर बीमारी का सबसे अच्छा डॉक्टर हो सकता है। क्यों कि वह अपने दुःख तकलीफ का जितनी गहराई से महसूस कर सकता है इसे कोई डॉक्टर भी नहीं कर सकता। वह जितनी गहराई से अपने दुःख को जानता है इसलिए वह स्वयं का डाक्टर हो सकता है उसको कुछ ज्ञान की जरूरत नहीं है और कुछ ज्ञान से वह हर प्रकार की बीमारी से लड़ सकता है और दूसरों की मदद कर सकता है। आयुर्वेद के पंण्डित भी इस बात को मानते हैं वह कहते हैं कि षरीर का 85 प्रतिषत हिस्सा इतना सरल और आसान है कि इसका इलाज आप खुद कर सकते हैं। मात्र 15 प्रतिषत षरीर का हिस्सा ऐसा है कि जिस में आपको किसी विषेशज्ञ की जरूरत पड़ सकती है। यहॉ यह कहना उचित है कि 15 प्रतिषत हिस्से वाले भाग में बहुत कम बीमारियॉ हैं। और 85 प्रतिषत जिसे आप जानते हैं उसमें बीमारी बहुत अधिक हैं।
85 प्रतिषत हिस्से में वाग्भट्ट जी कहते हैं अपने षरीर को जान लीजिये भोजन को पहचान लीजिए इससे आप स्वयं के 100 प्रतिषत डॉक्टर हैं। थोड़े षरीर के अंगों का ज्ञान हो, अंग उपांग हृदय, लिवर किडनी आदि की षरीर में स्थिति एक अंग
का दूसरे अंग से सम्बन्ध।
वाग्भट्ट जी कहते हैं कि जिसने भोजन को जान लिया रसोई को पहचान लिया, उसे कभी भी चिकित्सक की जरूरत नहीं पडेगी। जीवन की सबसे बडी विज्ञान रसोईघर है। भोजन विज्ञान अथवा पाक षास्त्र, कला विज्ञान।
वाग्भट्ट जी का सूत्र है कि भोजन को बनाते समय सूर्य का प्रकाष- पवन का स्पर्ष जरूरी है। वह भोजन कभी नहीं करना जो विश है। विश दो प्रकार का होता है। एक वो जो तत्काल असर करता है दूसरा वो विश है जो धीरे-धीरे असर करता है। ैसवू चवपेवद धीरे-धीरे आपको मारेगा। यहॉ हम रसोई घर का वर्णन करेंगे।
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Good
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