भारत छोड़ो आन्दोलन 1942 -- 14 जुलाई 1942 को वर्धा में कांग्रेस कार्य - समिति की बैठक में गाँधी जी के इस विचार को पूर्ण समर्थन मिला की भारत में संवैधानिक गतिरोध तभी दूर हो सकता है जब अंग्रेज भारत से चले जाएँ। वर्धा में कांग्रेस कार्य - समिति ने भारत छोड़ो प्रस्ताव पारित किया। आन्दोलन की सार्वजनिक घोषणा से पूर्व 1 अगस्त 1942 को इलाहाबाद में तिलक दिवस मनाया गया। वर्धा प्रस्ताव के निर्णय को मूर्तरूप प्रदान के लिए 7 अगस्त 1942 को बम्बई में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का अधिवेशन शुरू किया। काफी विचार - विमर्श के बाद 8 अगस्त 1942 को भारत छोड़ो प्रस्ताव पूर्ण बहुमत से पारित कर दिया गया। इसी दौरान गाँधी जी ने करो या मरो का नारा दिया। भारत छोड़ो आन्दोलन के प्रमुख कारण -- क्रिप्स प्रस्ताव की असफलता -- सर स्टेफोर्ड क्रिप्स की अध्यक्षता में क्रिप्स मिशन मार्च 1942 में भारत आया था। इस मिशन का प्रमुख उद्देश्य भारत के संवैधानिक गतिरोध को दूर करना और स्वतंत्रता - प्राप्ति के मार्ग में आने वाली समस्याओं को सुलझाने के लिए सिफारिशें प्रदान करना था। इस मिशन के प्रस्ताव भारत में राजनितिक दलों को सन्तुष...
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सविनय अवज्ञा आन्दोलन -- भारतीयों की माँगों के प्रति अंग्रेजी सरकार के निरस्त उपेक्षापूर्ण रवैया अपनाने से महात्मा गाँधी यह समझ गए की ब्रिटिश सरकार स्वेच्छा से भारत को स्वराज्य प्रदान नहीं करेगी। इसके लिए भारतीयों को व्यापक स्तर पर एक आन्दोलन करना पड़ेगा। गाँधी जी द्वारा वायसराय लॉर्ड इरविन के सम्मुख रखे गए माँग - पत्र पर विचार नहीं होने के कारण सविनय अवज्ञा आन्दोलन शुरू हो गया था। यह आन्दोलन दो चरणों में हुआ। पहला चरण मार्च 1930 से मार्च 1931 तह चला तथा दूसरा चरण 1932 में प्रारम्भ हुआ। सविनय अवज्ञा आन्दोलन के कारण -- साइमन कमीशन को लेकर असन्तोष -- 1928 में भारत आए साइमन कमीशन में कोई भी भारतीय सदस्य शामिल नहीं था। कमीशन की ओर से जारी रिपोर्ट में भी भारतियों के हितों की बात नहीं की गई। इस बात से नाराज कांग्रेस एवं अन्य दलों ने कमीशन का बहिस्कार करके हड़तालों , काली झण्डियों तथा साइमन कमीशन वापस जाओ के नारे से उसका स्वागत किया। भारतीय जनता में ब्रिटिश सरकार के प्रति असन्तोष और अधिक बढ़ गया। नेहरू रिपोर्ट की उपेछा -- भारतीय दलों के नेताओं ने संविधान के निर्माण के लिए 10...
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राष्ट्रीय आन्दोलन 1923 - 39 -- स्वराज्य दल -- असहयोग आन्दोलन की असफलता से दुःखी होकर 1923 में चितरंजन दास और मोतीलाल नेहरू ने विधानपरिषद का बहिस्कार करने के बदले उनमे प्रवेश कर असहयोग की नीति अपनाने का सुझाव दिया। 31 दिसंबर 1922 को चितरंजन दास ने मोतीलाल नेहरू , विटठलभाई पटेल , मदन मोहन मालवीय आदि के साथ मिलकर स्वराज्य दल इलाहाबाद में स्थापना की। चितरंजन दास स्वराज्य दल के अध्यक्ष और मोतीलाल नेहरू सचिव बनाए गए। 1923 के चुनावों में स्वराज्य दल ने मध्य प्रान्त में पूर्ण बहुमत , बंगाल , उत्तर प्रदेश , बम्बई प्रान्त में प्प्रधानता और केन्द्रीय विधानसभा में 101 से 45 स्थान प्राप्त किए। इस कारण स्वराज्य दल के सदस्य विटठलभाई पटेल केन्द्रीय मंत्रिपरिषद के अध्यक्ष भी चुने गए। स्वराज्य दल के सदस्यों ने भारत शासन अधिनियम 1919 में सुधार करने की माँग उठाई। विवश होकर सरकार ने अधिनियम में सुधार के लिए भारत में एक आयोग भेजने की घोषणा की। 1924 में स्वराज्य दल ने बजट को भी अस्वीकार कर दिया। 1926 में स्वराज्य दल का कांग्रेस में विलय हो गया। साइमन कमीशन 1927 -- 1919 के भारत शासन अधिनि...
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असहयोग आन्दोलन के परिणाम -- आर्थिक लाभ -- असहयोग आन्दोलन के दौरान विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करने और स्वदेशी वस्तुओं को अपनाने से बाजार में भारतीय वस्तुओं की माँग बढ़ गई। इससे मजदूरों , कामगरों और किसान को प्रत्यक्ष रूप से आर्थिक लाभ हुआ। निर्भीकता की भावना का विकास -- असहयोग आन्दोलन ने भारतीय के मन में निर्भीकता की भावना उतपन्न कर दी। भारतीय जनमानस में यह विचार उतपन्न हो गया कि सरकार के आतंक से डरने के बजाय उसका डटकर मुकाबला करके ही स्वतंत्रता को प्राप्त किया जा सकता है। हिन्दू - मुस्लिम एकता तथा स्वराज का सन्देश -- असहयोग आन्दोलन का देश में व्यापक प्रसार हुआ था , इससे देश के प्रत्येक वर्ग के लोगों ने प्रतिभाग किया। किसान मजदूर , निरक्षर और बुद्धिजीवी लोग एक - दूसरे के सम्पर्क में आए और राष्ट्रीयता के मुद्दे पर विचार साझा किए। इस प्रकार असहयोग आन्दोलन के कारण उनमें राष्ट्रीयता का विकास हुआ। कांग्रेस के दृष्टिकोण व् कार्यक्रम में बदलाव -- असहयोग आन्दोलन के पश्चात कांग्रेस ने अपने कर्यक्रम और किया। पहले जहाँ दृष्टिकोण में व्यापक परिवर्तन काँग्रेस सरकार की नीतियों का वैधान...
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असहयोग आन्दोलन का कार्यक्रम -- असैनिक श्रमिक व कर्मचारी वर्ग मेसोपोटामिया में जाकर नौकरी करने से इनकार करें। सरकारी उपाधि एवं अवैतनिक सरकारी पदों को छोड़ दिया जाए। विदेशी सामानों का पूर्णतः बहिस्कार तथा हठकरया द्वारा खादी के उत्पादन का विकास। सरकारी स्कूलों और कॉलेजों का बहिस्कार तथा वकीलों द्वारा न्यायालय का बहिस्कार किया जाए। सरकार द्वारा आयोजित सरकारी तथा अर्द्ध - सरकारी उतसवो का बहिस्कार किया जाए। सरकार को कर देने से इनकार किया जाए तथा कानूनों का शान्तिपूर्ण ढंग से विरोध किया जाए। राष्ट्रीय एकता को जाग्रत करने के लिए हिन्दू - मुस्लिम एकता का विकास। असहयोग आन्दोलन की प्रगति -- गाँधी जी ने केसर - ए - हिन्द की उपाधि लौटाकर असहयोग आन्दोलन की शुरुआत की। बड़ी संख्या में छात्रों ने सरकारी और अर्द्ध - सरकारी शिक्षण संस्थाओं का बहिष्कार किया। काशी विद्यापीठ , बिहार विद्याथीप , अलीगढ़ विद्यापीठ और गुजरात विद्यापीठ जैसी शिक्षण संस्थानों की स्थापना हुई। मोतीलाल नेहरू , देशबन्धु चितरंजन दास , सरदार वललभाई पटेल , चक्रवती राजगोपालचारी , राजेंद्र प्रसाद आदि ने न्यायालयों का बहिष्क...
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खिलाफत तथा असहयोग आन्दोलन 1919 से 1922 -- यद्यपि 1917 में गाँधी जी ने भारतीय राजनिती में प्रवेश कर लिया था , लेकिन भारतीय राष्ट्रिय आन्दोलन नेतृत्व उन्होंने लोकमान्य तिलक की मृत्यु के बाद 1920 में सम्भाला था। खिलाफत आन्दोलन -- प्रथम विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन और तुर्की के मध्य हुई सेवर्स की सन्धि से तुर्की के सुल्तान के सभी अधिकार छिन गए थे। इससे तुर्की राज्य छिन्न - भिन्न हो गया। संसार के सभी मुसलमान तुर्की के सुल्तान को अपना खलीफा धर्मगुरु मानते थे। मुसलमानों ने खलीफा के पक्ष में आन्दोलन चलाया , जिसे खिलाफत आन्दोलन के नाम से जाना जाता है। खिलाफत शब्द की उतपत्ति खलीफा शब्द से ही हुई है , जिसका अर्थ होता है , खलीफा से संबन्धित। विभिन्न परिस्थितियों के कारण यह आन्दोलन भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन का भाग बन गया था। प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ने भारतीय मुसलमानों से युद्ध में सहयोग की अपील की थी और बदले में तुर्की के साथ सहानुभूति का आश्वासन दिया था। विश्वयुद्ध के समाप्त होने पर ब्रिटिश सरकार ने तुर्की के विघटन की भूमिका तैयार कर दी। इससे भारतीय मुसलमानो...
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सत्याग्रह का अर्थ -- सत्याग्रह दो शब्दों से मिलकर बना है - सत्य + आग्रह जिसका शाब्दिक अर्थ है - सत्य के लिए आग्रह करना। सत्याग्रह के तहत सत्य की शक्ति के बल पर आग्रह द्वारा सत्य की खोज पर जोर दिया जाता है। गाँधी के अनुसार , सत्याग्रह का मार्ग अपनाकर न तो शत्रु को कष्ट पहुँचता है और न ही विनाश होता है। सत्याग्रह अपनाने के लिए शारीरिक बल की भी आवश्यकता नहीं है। महात्मा गाँधी का सत्याग्रह आन्दोलन -- महात्मा गाँधी ने दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद नीति के खिलाफ सत्याग्रह आन्दोलन का सफल संचालन किया था। भारत में इन्होने सत्याग्रह आंदोलन को अपनाया। चम्पारण सत्याग्रह -- गाँधी जी ने भारत में सर्वप्रथम चम्पारण में ही सत्याग्रह का प्रयोग किया था। बिहार के चम्पारण जिले में किसानों को अपनी जमीन के 3/20 भाग पर अनिवार्य रूप से नील की खेती करनी पड़ी थी और अपना उत्पादन बागान मालिकों द्वारा निर्धारित दरों पर ही बेचना पड़ता था। यह किसानों के लिए घाटे का सौदा था। जर्मनी द्वारा कृत्रिम नील को खोज कर लेने के बाद अन्तर्राष्ट्रीय बाजारों में प्राकृतिक नील की माँग कम होने लगी ,क्योकि वह महँगी पड़ती थी। इसका...
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गाँधीवादी विचारधारा -- भारतीय राष्ट्रिय आन्दोलन के इतिहास में 1919 से 1947 तक का काल महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इस काल को गाँधी युग के नाम से जाना जाता है , क्योकि यही वह समय था , जब महात्मा गाँधी राष्ट्रिय आन्दोलन में शामिल हुए। देश को गुलामी से मुक्त करने के लिए महात्मा गाँधी ने सत्य और अहिंसा का मार्ग अपनाया। उनके द्वारा चलाए गए असहयोग सविनय अवज्ञा और भारत छोड़ो आन्दोलन से जनमानस प्रत्यक्ष रूप से जुड़ता चला गया। महात्मा गाँधी का प्रारम्भिक जीवन -- महात्मा गाँधी का पूरा नाम मोहनदास करमचन्द गाँधी था। इनका जन्म 2 अक्टूबर 1869 को गुजरात के पोरबन्दर नामक स्थान पर हुआ था। इनके पिता करमचन्द और माता का नाम पुतलीबाई था। 1891 में महात्मा गाँधी इग्लैण्ड से वकालत की उपाधि लेकर भारत आए। इन्होने बम्बई और राजकोट में वकालत की 1893 में वह एक मुकदमे की पैरवी करने के लिए दक्षिण अफ्रीका गए। दक्षिण अफ्रीका में अंग्रेज अश्वेत और रंगभेद की नीति अपनाते थे। गाँधी जी को भी दुर्व्यवहार सहना पड़ा। दक्षिण अफ्रीका में उन्होंने रंगभेद की इस नीति के खिलाफ सत्याग्रह आन्दोलन चलाया। अपने उद्देश्य की पूर्ति क...
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भारतीय समाज पर नवजागरण का प्रभाव -- समाज के प्रत्येक वर्ग और क्षेत्र पर भारतीय समाज का व्यापक प्रभाव पड़ा नवजागरण ने भारतीय जनमानस में नवचेतना का संचार किया। अन्धविश्वास और कर्मकाण्ड का विरोध -- नवजागरण का उदय होने से धार्मिक जीवन में कर्मकाण्ड परिवर्तन हुए। सुधार आन्दोलन के प्रवर्तक ने आडंबरो का विरोध कर जनमानस को जागरूक करने का प्रयत्न किया इससे कर्मकाण्ड का प्रभाव कम हो गया। प्राचीन साहित्य का महत्व -- समाज सुधार आन्दोलन के प्रवर्तकों ने वेद और उपनिषद के प्रति भारतीयों को जागरूक किया। इससे लोगों में प्राचीन दर्शन , साहित्य , कला और विज्ञानं के प्रति रुची पैदा होने लगी। देशभर में संस्कृत भाषा का प्रचार - प्रसार होने लगा। भारतीय संस्कृति के प्रति झुकाव -- समाज सुधार आन्दोलन ने यह सिद्ध कर दिया था की विश्व की संस्कृतियों में भारत की संस्कृति ही सर्वश्रेष्ठ और प्राचीन है। इससे भारतीयों का झुकाव पाश्चात्य संस्कृति के बजाय फिर से भारतीय संस्कृति के प्रति हो गया था। भारतीय वर्ग में अपने धर्म और दर्शन को जानने के लिए अध्ययन की प्रवृति बढ़ने लगी थी। सामाजिक कुरीतियों का विरोध -- ...
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कूका या नामधरी आन्दोलन -- 19 वीं शताब्दी में पंजाब के कई धार्मिक और सामाजिक आन्दोलन हुए। इस आन्दोलनों के कूका आन्दोलन का स्थान प्रमुख है। कूका आन्दोलन के समर्थकों का प्रमुख सिद्धान्त ईश्वर के नाम का जप करना था , इसलिए इसे नामधारी आन्दोलन भी कहा जा सकता है। इस सम्प्रदाय से जुड़े लोग जोर - जोर से ईश्वर के भजन गेट थे ,इसलिए इन्हें कूके चिल्लाने वाला भी कहा गया। कूका आन्दोलन की स्थापना गुरु बालक सिंह ने की थी , लेकिन वास्तविक संस्थापक और प्रणेता गुरु राम सिंह 1816 - 85 थे। 1838 में गुरु राम सिंह , गुरु बालक सिंह के विचारों से प्रभावित होकर उनके शिष्य बन गए थे। 1857 में राम सिंह ने अपने गाँव में नामधारी आन्दोलन की नींव रखी। गुरु राम सिंह ने सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध प्रचार - प्रसार किया। उन्ही के नेतृत्व में नामधारियों ने पंजाब में सिख राज्य की पुनर्स्थापना का प्रयास किया। नामधारी आन्दोलन के प्रचार - प्रसार करे लिए गुरु रामसिंह ने देशभर में प्रचार केन्द्र स्थापित किए। पंजाब में ही इन केन्द्रों की संख्या 22 थी। दीप्ती नामक अधिकारी इन प्रचार केन्द्रों की कमान सम्भालता था। 1871 में इस...
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मुस्लिम सुधार आन्दोलन -- 19 वीं शताब्दी तक मुस्लिम समाज और इस्लाम धर्म में भी सामाजिक बुराइयों का समावेश हो गया था। हिन्दू आन्दोलन की प्रतिक्रियास्वरूप मुस्लिम समान भी नवजागरण आन्दोलन से अछूता नहीं रहा। वहाबी आन्दोलन -- भारत का वहाबी आन्दोलन अरब के वहाबी आन्दोलन से प्रभावित था। इस आन्दोलन की शुरुआत अरब में मुहम्मद अब्दुल वहाब ने की थी। भारत में इस आन्दोलन का पचार - प्रसार सैयद अहमद बरेलवी 1786 - 1831 में किया था। इस आन्दोलन का प्रमुख उद्देश्य अपने धर्म का प्रचार करना और मुस्लिम समाज की कुरीतियों को दूर करना था। सैयद अहमद बरेलवी ने जनसाधारण के सरलता से समझने योग्य बनाने के लिए कुरान को उर्दू भाषा में अनुवादित कराया। अलीगढ़ आन्दोलन -- मुस्लिम सुधार आन्दोलन में अलीगढ़ आन्दोलन का महत्वपूर्ण स्थान है। इस आन्दोलन के प्रवर्तक सर सैयद अहमद खाँ 1817 - 1893 थे। इन्होंने अंग्रेजी शिक्षा का समर्थन किया। वह सरकार और मुसलमान के बीच दूरी को समाप्त करना चाहते थे। उन्होंने 1875 अलीगढ़ मोहम्मडन एंग्लो ओरिएण्टल कॉलेज स्थापना की। 1920 में यह कॉलेज अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय...
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रामकृष्ण मिशन स्वामी विवेकानन्द -- रामकृष्ण मिशन की स्थापना 1897 में वेल्लूर में स्वामी विवेकानन्द ने अपने गुरु स्वामी रामकृष्ण परमहंस जो एक संत एवं चिंतक थे , की स्मृति में की थी। स्वामी विवेकानन्द -- स्वामी विवेकानन्द का जन्म 12 जनवरी 1863 को कलकत्ता के एक कायस्थ परिवार में हुआ था। इनके बचपन का नाम नरेन्द्रनाथ दत्त था। इन्होंने पाश्चात्य दर्शन के साथ हिन्दू धर्म और दर्शन का भी गहन अध्ययन किया था। लगभग 20 वर्ष की आयु में वह रामकृष्ण परमहंस के सम्पर्क में आए और अपनी विचारधारा , लगन तथा समाज कल्याण की भावना के कारण जल्द ही रामकृष्ण परमहंन्स के प्रिय शिष्य बन गए। स्वामी विवेकानन्द संस्कृत और अंग्रेजी के उच्च कोटि के बक्ता थे। अपनी योग्यता के बल पर उन्हें 1893 में शिकांगो में आयोजित विश्व धर्म सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधत्व करने का अवसर मिला। संयुक्त राज्य अमेरिका जाने के पूर्व महाराज खेतड़ी के सुझाव पर उन्होंने अपना नाम नरेन्द्रनाथ के बजाय स्वामी विवेकानन्द रख लिया। उन्होंने दिन - दुखियों की निःस्वार्थ सेवा की 14 जुलाई 1902 को मात्र 39 वर्ष की आयु में उनका देहावसान हो गया। उनके ...
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सत्यशोधक समाज ज्योतिबा फूले -- सत्यशोधक समाज की स्थापना ज्योतिबा फूले ने 24 सितंबर 1873 को की थी। उन्होंने इस संगठन के माध्यम से दलित वर्गों को न्याय दिलाने की दिशा में आन्दोलन चलाया। इनका जन्म 11 अप्रैल 1827 को सतारा महाराष्ट्र के कोटगन गाँव में हुआ। इनके परिवार में फूलों का काम होता था , इसलिए उन्हें फूले भी कहा जाता था। इन्होंने ब्राह्मणों के कर्मकाण्ड विरोध किया और इसके प्रति लोगों को भी जागरूक किया। महाराष्ट्र में अछूतोद्धार एवं महिला शिक्षा दिशा में कदम उठाने वाले पहले व्यक्ति थे। ज्योतिबा फूले ने गुलाम गिरी और सार्वजनिक सत्यधर्म नामक पुस्तक की रचना की। वर्ष 1888 में बम्बई की सभा में इन्हें महात्मा की उपाधि दी गई। 28 नवमबर 1890 पूर्ण में इनका निधन हो गया। सत्यशोधक समाज के प्रमुख सिद्धांत -- 1 स्त्रियों समाज में उच्च स्थान दिलाने के लिए प्रेरित करना। 2 शिक्षा के क्षेत्र में सुधार लाना। 3 जातिगत भेदभाव , छुआछूत और वर्गीय भेदभाव का विरोध करना। 4 समाज में सर्वधर्म समभाव और पारस्परिक सहनशीलता भावना उतपन्न करना। 5 ...
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आर्य समाज स्वामी दयानन्द सरस्वती -- आर्य समाज की स्थापना दयानन्द सरस्वती ने 1875 में बम्बई में की थी। स्वामी दयानन्द सरस्वती का जन्म 1824 में काठियावाड़ गुजरात के एक ब्रह्ममण परिवार में हुआ था। इनके बचपन का नाम मूलशंकर था। बचपन में साथ एक घटना घटित हुई। इन्होने मन्दिर में शिवरात्रि के पर्व पर शिवलिंग पर एक चूहे को घूमते हुए देखा इनके मन में विचार आया कि मूर्तिपूजा एक पाखण्ड है। 22 वर्ष की आयु में इन्होंने गृह त्याग कर दिया। मथुरा में इन्होंने स्वामी विरजानन्द से वैदिक धर्म के विषय में ज्ञान प्राप्त किया। स्वामी जी ने आगरा से अपने उद्देश्यों का प्रचार - प्रसार किया। इन्होंने मूर्ति पूजा , बहुदेववाद , अवतारवाद , पशुबलि प्रथा यंत्र - मंत्र - तंत्र और कर्मकाण्ड विरोध किया। इन्होंने सन्देश दिया कि वेदों आधार पर भारतीय समाज का पुनः निर्माण किया जा सकता है। स्वामी दयानन्द सरस्वती ने पुनः वेदों की ओर लौटो का नारा दिया। स्वामी दयानन्द सत्यार्थ प्रकाशन नामक पुस्तक की रचना की 30 अक्टूबर 1883 को इनका निधन हो गया था। आर्य समाज के सिद्धान्त -- 1 वेद ही सत्य और...
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ब्रह्म समाज के प्रमुख कार्य -- सामाजिक कुप्रथाओं का अन्त -- इनके समय सती प्रथा एक ज्वलन्त समस्या थी। इसके विरोध के लिए इन्होंने अपनी पत्रिका संवाद कौमुदी का उपयोग किया। सरकार द्वारा 1829 में सती प्रथा पर प्रतिबन्ध लगाए जाने का स्वागत किया। और इस प्रक्रिया रूढ़िवादियों द्वारा दायर याचिका का इग्लैण्ड में भी विरोध किया। इन्होंने विधवा पुनर्विवाह में आन्दोलन चलाया। बाल विवाह का विरोध , जाति प्रथा , छुआछात का विरोध इत्यादि इनके प्रमुख उद्देश्य थे। राष्ट्रीयता की भावना का विकास करना -- यध्यपि राजा राममोहन राय ने प्रत्यक्ष रूप से राजनीति नहीं लिया , किन्तु ये स्वतंत्रता एवं राष्ट्रीयता के कटटर समर्थक थे। इन्होंने लोगों में राष्ट्रीयता की भावना जाग्रत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई तथा लोगों को एकता के सूत्र में बाँधने का प्रयास किया। इनके द्वारा प्रेस की स्वतंत्र्रता पर बल दिया गया , जिसके माध्यम से लोगों में जागरूकता का विकास हुआ। सामाजिक भेदभाव का उन्मूलन -- ब्रह्म समाज ने भातृत्व प्रेम व् एकेश्वरवाद के माध्यम से सामाजिक भेदभाव के उन्मूलन हेतु प्रयास किए तथा सभी ...
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19 वीं शताब्दी के धर्मिक और समाजिक सुधार आन्दोलन -- 19 वीं शताब्दी में भारत में अनेक सामाजिक एवं धर्मिक सुधार आन्दोलन हुए। इन आन्दोलनों का भारतीय जनमानस के मस्तिष्क पर व्यापक प्रभाव पड़ा। समाज से अन्धविश्वास तथा अन्य कुरीतियाँ दूर हो गई , जिन्होंने समाज को एक नई दिशा प्रदान की तथा राष्ट्र्रीयता की भावना को जाग्रत किया। ब्रह्म समाज राजा राममोहन राय -- ब्रह्म समाज की स्थापना 1828 में कलकत्ता में राजा राममोहन राय ने की थी। ब्रह्म समाज 19 वीं शताब्दी का पहला सुधार आन्दोलन था। राजा राममोहन राय का जन्म 22 मई 1772 को बंगाल के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। राजा राममोहन राय को बंगाली , संस्कृत और अरबी - फारसी का अच्छा ज्ञान था। इसके अतिरिक्त उन्होंने अंग्रेजी , फ्रेंच और लैटिन भाषा का भी अध्ययन किया। राजा राममोहन राय ने एकेश्वरवाद में विकास किया और मूर्ति पूजा , अवतारवाद का विरोध किया। राजा राममोहन राय के उद्देश्यों का सार सर्वधर्म सम्भव था। 1815 में इन्होंने कलकत्ता में आत्मीय सभा की स्थापना की। इनके द्वारा 1819 में बंगाली समाचार - पत्र संवाद कौमुदी की शुरुआत की गई तथा 1819 में ही इन...
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1857 के स्वतंत्रता संग्राम का परिणाम -- 1857 का स्वतंत्रता संग्राम हालाँकि असफल रहा , लेकिन इस आन्दोलन ने भारत की दिशा बदल दी। ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शासन का अन्त -- प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद ब्रिटिश संसद ने भारत से ईस्ट इण्डिया कम्पनी का शासन समाप्त कर दिया। 1 नवंबर 1857 को महारानी विक्टोरिया की घोषणा के आधार पर भारतीय शासन की बागडोर सीधे इग्लैण्ड सरकार हाथों में आ गई अर्थात भारतीय शासन पर ब्रिटिश की संसद का नियंत्रण स्थापित हो गया। गवर्नर जनरल के पद की समाप्ति -- भारतीय शासन पर ब्रिटिश संसद सर्वोच्चता स्थापति होने से भारत में गवर्नर जनरल के पद का अन्त कर दिया गया। अब गवर्नर जनरल के स्थान पर वायसराय का पद बनाया गया। .अन्तिम गवर्नर जनरल लॉर्ड केनिंग को ही भारत का प्रथम वायसराय बनाया गया , साथ ही बोर्ड ऑफ कण्ट्रोल और बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स को भंग करके उनके स्थान पर भारत मंत्री का पद सृजित किया गया। मुगल साम्राज्य और पेशवा के पद का अन्त -- 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान ब्रिटिश अधिकारीयों अन्तिम मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर बन्दी...
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प्रथम स्वाधीनता संग्राम की असफलता के कारण -- प्रथम स्वाधीनता संग्राम के दौरान क्रांतिकारियों ने वीरता , साहस और उत्साह के बल पर अंग्रेजों के दाँत खट्टे कर दिए थे , लेकिन कूटनीति और षड्यंत्र के बल पर अंग्रेज इस आन्दोलन को दबाने में सफल रहे। समय से पूर्व क्रान्ति की शुरुआत -- अंग्रेजी साम्राज्य के विरुद्ध विद्रोह के लिए 31 मई 1857 की तिथि निश्चित की गई थी , लेकिन चर्बी वाले कारतूस की घटना के कारण 10 मई 1857 को मेरठ में विद्रोह हो गया। विद्रोह की यह आग देश के अन्य हिस्सों में धीरे - धीरे फैली। यदि यह विद्रोह पुरे देश में एक ही तिथि को होता , तो अंग्रेजों के लिए इसका दमन करना सम्भव नही था। कुशल नेतृत्व का आभाव -- क्रांतिकारियों ने वीरता और साहस का परिचय देते हुए प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों से कड़ा मुकाबला किया था , लेकिन उनमे योग्य नेतृत्व का आभाव था। बहादुरशाह जफर बुजुर्ग होने के कारण युद्ध - क्षेत्र में जाने में असमर्थ थे। नाना साहब ने भी दूरदर्शिता का आभाव था। इसके विपरीत अंग्रेजी सेना में नील , आउटरम , हूरोज , निकलसन , कैंपबेल जैसे योग्य सेनापति थे। उचित संगठन व् य...
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1857 के स्वाधीनता संग्राम के प्रमुख नेता -- मंगल पाण्डे -- मंगल पाण्डे बैरकपुर बंगाल की ब्रिटिश छावनी में तैनात वीर सैनिक था। 29 मार्च 1857 को परेड के दौरान उसने चर्वी युक्त कारतूसों का प्रयोग करने से इनकार कर दिया। क्रोधित अंग्रेज अधिकारियों ने मंगल पाण्डे को हथियार डालने का आदेश दिया , तो इसने दो अंग्रेज अधिकारियों लेफ्टिनेण्ड बाग एवं लेफ्टिनेण्ट जनरल हुमस को गोली मारकर हत्या कर दी। अंग्रेजों ने 8 अप्रैल 1857 को मंगल पाण्डे को फाँसी की सजा दी। मंगल पाण्डे का यह बलिदान ही 1857 की क्रान्ति का तात्कालिक कारण बना। बहादुरशाह जफर -- बहादुरशाह जफर भारत के अन्तिम मुगल सम्राट थे। 10 मई 1857 को मेरठ से क्रान्ति का सूत्रपात होने पर अगले दिन क्रन्तिकारी बड़ी संख्या में दिल्ली पहुँचे। क्रांतिकारियों ने इन्हे अपना नेता चुना। बहादुरशाह जफर की वीरता के कारण 3 माह तक अंग्रेज दिल्ली पर कब्जा नही कर सके। अंग्रेजों की कूटनीति के तहत बहादुरशाह जफर को बन्दी बनाकर रंगून बर्मा भेज दिया गया। रंगून में ही 1862 में बहादुरशाह जफर की मौत हो गई। नाना साहब -- इनका वास्तविक नाम धोंडू पन्त था। ये मराठा पेशव...
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विद्रोह का आरम्भ और प्रमुख घटनाएँ -- 1857 के विद्रोह की पहली घटना की शुरुआत 29 मार्च 1857 को बंगाल में स्थित बैरकपुर नामक स्थान पर ब्रिटिश छावनी में मंगल पाण्डे द्वारा किया गया। इसके परिणामश्वरूप 8 अप्रैल 1857 को मंगल पाण्डे को फांसी दी गई , जिससे विद्रोह भड़क गया। 1857 के विद्रोह के आरम्भिक स्थान -- मेरठ -- 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की शुरुआत मेरठ से हुई थी। 9 मई 1857 को अश्वारोही सैनिक दल के 85 सैनिकों ने चर्बी वाले कारतूसों का प्रयोग करने से इनकार कर दिया था। इस पर अंग्रेज अधिकारियों ने उन्हें दण्डित किया। 10 मई 1857 को अन्य सैनिकों ने विद्रोह कर दिया और जेल तोड़कर अपने साथियों को मुक्त करा लिया। इसके बाद मेरठ के सैनिकों ने दिल्ली का रुख किया। दिल्ली -- यहाँ पहुँचकर सैनिकों ने मुगल सम्राट बहादुरशाह जफर द्वितीय को अपना सम्राट घोषित कर दिया। प्रारम्भिक दौर में अंग्रेजों की स्थिति कमजोर होती चली गई। इसी बीच जनरल निकलसन के नेतृत्व में अंग्रेजों की बड़ी सेना पंजाब से दिल्ली आ गई। कई दिनों तक चले संघर्ष में अंग्रेजों की विजय हुई। कैप्टन हडसन ने सम्रा...