अल्प उत्पादकता --

एक निश्चित समय में उत्पादन के किसी साधन द्वारा अपनी क्षमता से कम उत्पादन करना अल्प उत्पादकता कहलाता है। इससे तातपर्य यह है कि उत्पादन के लागत एवं निर्गत के नकारात्मक अनुपात का होना। उदाहरण के लिए किसी मशीन की क्षमता एक घण्टे में 100 वस्तु उत्पादन करने की है , लेकिन मशीन एक घण्टे में केवल 50 वस्तु का उत्पादन कर रही है , इसका अर्थ है कि मशीन की उत्पादकता अल्प है।

औद्योगिक अकुशलता एवं अल्प उत्पादकता के कारण --

औद्योगिक अकुशलता एवं अल्प उत्पादकता के कारण भारत में अभी भी उच्च कोटि के तकनीकी प्रशिक्षण की सुविधाएँ उपलब्ध नहीं है। तकनीकी पिछड़ापन , अल्प उत्पादकता का एक मुख्य कारण है।

पूँजीगत आभाव -- औद्योगिक कार्यकुशलता को बेहतर करने अथवा आधुनिकीकरण के लिए बड़ी मात्रा में पूँजी को आवश्यकता होती है। भारत में वित्तीय संस्थाओं की अपर्याप्त उपलब्धता औद्योगिक उत्पादकता एवं कार्यकुशलता को प्रभावित करती है।

कच्चे माल का आभाव -- भारत में बहुत से उद्योग कच्चे माल के लिए विदेशी आयात पर निर्भर रहते है इससे उत्पादन लागत बढ़ने के अतिरिक्त उपयुक्त समय पर गुडवत्ता वाला कच्चा माल उपलब्ध नहीं हो पाता है। इससे उत्पादकता एवं कार्यकुशलता प्रभावित होती है।

ऊर्जा साधनो की कमी -- औद्योगिक उत्पादकता को सबसे अधिक संकट उद्योगों के लिए ही नहीं , अपितु सभी क्षेत्रों के संकट का कारण है। पेट्रोलियम पदार्थों की कमी तथा कोयले की निमन गुणवत्ता ऊर्जा समस्या को और अधिक गम्भीर बना देती है।

परिवहन एवं संचार का अल्प विकास -- कच्चे माल को उद्योग तक तथा उत्पादित माल को बाजार तक पहुँचाने में परिवहन एवं संचार साधनों का काफी महत्व होता है , लेकिन भारत में संरचनात्मक सुविधाओं का पर्याप्त विकास नहीं होने से उत्पादकता प्रभावित होती है।

कुशल श्रमिकों का प्रभाव -- अधिक जनसंख्या की स्थिति के बाद भी भारत में श्रम समस्या बनी रहती है। इस समस्या का मूल कारण श्रमिक अशान्ति तथा कुशल श्रमिकों का आभाव है। इसका प्रत्यक्ष प्रभाव औद्योगिक उत्पादन एवं कार्यकुशलता पर पड़ता है।

प्रबन्धकीय अक्षमता -- औद्योगिक कारकुशलता प्रबन्धन की क्षमता पर निर्भर करती है। अक्षम प्रबन्धन से उत्पादन में कई तरह के गतिरोध उतपन्न हो सकता है। भारत में उच्च एवं व्यावसायिक शिक्षा में  व्याप्त कमी के कारण सक्षम प्रबन्धकों की कमी रहती है।

वित्तीय संस्थाओं की कमी -- नए उद्योगों की स्थापना एवं पुराने उद्योगों के आधुनिकीकरण के लिए बड़ी मात्रा में वित्तीय सहायता की आवश्यलता होती है। साख अथवा वित्तीय सहायता प्रदान करने वाली संस्थाओ तथा बैंकिंग व्यवस्था का पर्याप्त विकास नहीं हुआ है।

सरकारी नीति -- राजनितिक हस्तक्षेप एवं लालफीताशाही के कारण सरकार में इन उद्योगों के लिए बनाई गई नीतियों  अस्थिरता होती है। इस अस्थिरता के कारण निवेशकों का विश्वास कम होता है।

विदेशी शासन -- ब्रिटिश शासन की विभेदात्मक नीति का प्रभाव भारतीय उद्योगों पर इतना नकारात्मक था की स्वतंत्र्रता प्राप्ति के समय उद्योगों की संख्या नगण्य थी। विदेशी शासन के कारण यहाँ ाआधुनिक उद्योगों की स्थापना नहीं हो सकी। इस पिछड़ेपन का आभाव भारतीय उद्योग पर कई दशकों तक बना रहा।

अनुसन्धान एवं विकास में कमी -- औद्यगिक उत्पादकता एवं कार्यकुशलता में वृद्धि के लिए नई तकनीकों तथा नवाचार की आवश्यकता होती है , लेकिन भारत में औद्योगिक अनुसन्धान एवं विकास में कमी दिखाई पड़ती है। इसके लिए आवश्यक संरचनात्मक एवं संस्थागत सुबिधाओं का आभाव है।

सामाजिक पिछड़ापन -- भारत में कई सामाजिक कारक औद्योगिक विकास में बाधा उतपन्न करते है। परम्परागत सोच एवं रीति - रिवाज , निर्धनता आदि औद्योगिक विकास को प्रभावित करते है।

सस्ते शक्ति साधनों का आभाव -- उधोगों में उत्पादन के लिए सस्ते शक्ति साधनों की आवश्यकता होती है , जैसे - कोयला , बिजली और तेल , लेकिन भारत में इन सभी शक्ति साधनों का पर्याप्त मात्रा में आभाव पाया जाता है

अनियोजित विकास -- भर इ औद्योगिक विकास पूरी तरह से नियोजित नहीं है। इससे औद्योगिक उत्पादन की क्षमता प्रभावित होती है। कुछ उद्योग ऐसे स्थानों पर स्थापित किए गए है , जहाँ कच्चा माल एवं अन्य साधनों को उपलब्ध करना नहँगा पड़ता है। इसका प्रभाव उत्पादन पर पड़ता है। इसी त्तरह अधिकतर उद्दोगों का संकेन्द्रण महानगरों में है।  जिससे अन्य स्थानों पर औद्योगिक विकास नहीं हो पाता।






















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