ब्रह्म समाज के प्रमुख कार्य --

सामाजिक कुप्रथाओं का अन्त -- इनके समय सती प्रथा एक ज्वलन्त समस्या थी। इसके विरोध के लिए इन्होंने अपनी पत्रिका संवाद कौमुदी का उपयोग किया। सरकार द्वारा 1829 में सती प्रथा पर प्रतिबन्ध लगाए जाने का स्वागत किया। और इस प्रक्रिया  रूढ़िवादियों द्वारा दायर याचिका का इग्लैण्ड में भी विरोध किया। इन्होंने विधवा पुनर्विवाह  में आन्दोलन चलाया। बाल विवाह का विरोध , जाति प्रथा , छुआछात का विरोध इत्यादि इनके प्रमुख उद्देश्य थे।

राष्ट्रीयता की भावना का विकास करना -- यध्यपि राजा राममोहन राय ने प्रत्यक्ष रूप से राजनीति  नहीं लिया , किन्तु ये स्वतंत्रता एवं राष्ट्रीयता के कटटर समर्थक थे। इन्होंने लोगों में राष्ट्रीयता की भावना जाग्रत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई तथा लोगों को एकता के सूत्र में बाँधने का प्रयास किया। इनके द्वारा प्रेस की स्वतंत्र्रता पर बल दिया गया , जिसके माध्यम से लोगों में जागरूकता का विकास हुआ।

सामाजिक भेदभाव का उन्मूलन -- ब्रह्म समाज ने भातृत्व प्रेम व् एकेश्वरवाद के माध्यम से सामाजिक भेदभाव के उन्मूलन हेतु प्रयास किए तथा सभी को साथ मिलाकर एकजुट करने का प्रयास किया।

शिक्षा का प्रसार -- राजा राममोहन राय ने पाश्चात्य शिक्षा के प्रसार पर बल दिया। अनेक शिक्षण संस्थाएँ भी खोली गई , जिन्होंने भारतीय समाज में जाग्रति उतपन्न की। ब्रह्म समाज स्त्री शिक्षा के पक्ष में भी था।

धार्मिक सुधार -- ब्रह्म समाज ने वेदों तथा उपनिषदों के माध्यम से यह सिद्ध किया की ईश्वर एक है उन्होंने मूर्ति पूजा तथा धर्मकाण्डों का भी वीरोध किया , उन्होंने जनता को समझाया की हिन्दू धर्म सर्वोच्चतम है। लेकिन इसमें कुछ दोष उतपन्न  हैं , जिन्हें सरलता से दूर किया जा सकता है। उन्होंने हिन्दू धर्म का सरल रूप प्रस्तुत किया। इसे अन्य धर्म के प्रभावों  मुक्त कराने का प्रयास किया।

प्रार्थना समाज डॉ आत्माराम पाण्डुरंग --

प्रार्थना समाज की स्थापना 1867 में बम्बई में आचार्य केशवचन्द्र सेन की प्रेरणा से महादेव गोविन्द रानाडे डॉ आत्माराम पाण्डुरंग , चंद्रावरकर आदि ने थी। यह संगठन ब्रह्म समाज का ही एक रूप था। इस संगठन का प्रमुख उद्देश्य जाति का विरोध करना , स्त्री - पुरुष विवाह की आयु में वृद्धि करना , विधवा विवाह तथा स्त्री शिक्षा को प्रोत्साहिन देना था। रानाडे के प्रयत्नो के फलस्वरूप ही विधवा - विवाह संघ तथा देककन एजुकेशनल सोसायटी की नींव पड़ी , इन्हौने समाज सुधार के अलावा राष्ट्रीय आन्दोलन में भी भाग लिया। इस संस्था ने सुबोध पत्रिका नामक पत्र भी निकाला।

प्रार्थना समाज के सिद्धांत --

1  ईश्वर एक है और यह संसार उसकी रचना है।

2  ईश्वर की उपासना से ही प्राणी को लोक और परलोक में सुख की प्राप्ति होती है।

3  सभी प्राणी ईश्वर की सन्तान हैं। अतः सबको बिना किसी भेदभाव के आपसी भाईचारा बनाकर रखना  चाहिए।
4 श्रद्धा एवं प्रेम से की गई उपासना ही सच्ची उपासना है  .मूर्ति पूजा उपासना नहीं होती।

5  ईश्वर के अवतार नहीं होते और न ही उनके उपदेश किसी धर्मिक ग्रन्थ में मिलते हैं।

प्रार्थना समाज के कार्य तथा उपलब्ब्धियाँ -- प्रार्थना समाज ने जाति प्रथा के अन्त तथा विधवा विवाह  कार्य किए। स्त्री शिक्षा के प्रसार को अपना प्रमुख उद्देश्य बनाया। अछूतों के उद्धार के लिए अनाथालय , रात्रि पाठशाला इत्यादि की स्थापना की। प्रार्थना समाज ने समाज के दृष्टिकोण में बदलाव के लिए शिक्षा के कार्यक्रम को माध्यम बनाया। माध्यम के बीच सदभाव कायम किया।  
















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