1857 के स्वाधीनता संग्राम के प्रमुख नेता --
मंगल पाण्डे -- मंगल पाण्डे बैरकपुर बंगाल की ब्रिटिश छावनी में तैनात वीर सैनिक था। 29 मार्च 1857 को परेड के दौरान उसने चर्वी युक्त कारतूसों का प्रयोग करने से इनकार कर दिया। क्रोधित अंग्रेज अधिकारियों ने मंगल पाण्डे को हथियार डालने का आदेश दिया , तो इसने दो अंग्रेज अधिकारियों लेफ्टिनेण्ड बाग एवं लेफ्टिनेण्ट जनरल हुमस को गोली मारकर हत्या कर दी। अंग्रेजों ने 8 अप्रैल 1857 को मंगल पाण्डे को फाँसी की सजा दी। मंगल पाण्डे का यह बलिदान ही 1857 की क्रान्ति का तात्कालिक कारण बना।
बहादुरशाह जफर -- बहादुरशाह जफर भारत के अन्तिम मुगल सम्राट थे। 10 मई 1857 को मेरठ से क्रान्ति का सूत्रपात होने पर अगले दिन क्रन्तिकारी बड़ी संख्या में दिल्ली पहुँचे। क्रांतिकारियों ने इन्हे अपना नेता चुना। बहादुरशाह जफर की वीरता के कारण 3 माह तक अंग्रेज दिल्ली पर कब्जा नही कर सके। अंग्रेजों की कूटनीति के तहत बहादुरशाह जफर को बन्दी बनाकर रंगून बर्मा भेज दिया गया। रंगून में ही 1862 में बहादुरशाह जफर की मौत हो गई।
नाना साहब -- इनका वास्तविक नाम धोंडू पन्त था। ये मराठा पेशवा बाजीराव द्वितीय के दत्तक पुत्र थे। अंग्रेजों ने इन्हे 8 लाख रूपये की वार्षिक पेंशन देकर बिठूर भेज दिया था। लॉर्ड डलहौजी ने इनकी पेंशन भी बन्द कर दी। इससे भावनाओं का प्रचार - प्रसार किया। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में नाना साहब ने अंग्रेजों से कानपूर छीन लिया , लेकिन 6 दिसंबर 1857 को अंग्रेज कानपूर पर एक फिर कब्जा करने में सफल रहे।
कुँवर सिंह -- ये जगदीशपुर बिहार के राजा थे। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में कुँवर सिंह की बहादुरी के कारण अंग्रेजों को कई स्थानों पर शिकस्त मिली। ये छापामार युद्ध नीति में कुशल थे। 26 अप्रैल 1858 को कुँवर सिंह की मृत्यु हो गई।
तात्या टोपे -- ये एक सच्चे राष्ट्रभक्त और वीर सेनापति थे , इन्होने कई मोर्चों पर अंग्रेजी सेनाओं को पराजित किया। तात्या टोपे नाना साहब के प्रमुख सहयोगी थे। तात्या के एक विश्वासपात्र साथी की गददारी के कारण अंग्रेजों ने इन्हें बन्दी बनाकर 18 अप्रैल 1859 को उनकी हत्या कर दी।
वेगम हजरत महल -- इन्होने प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान लखनऊ में अंग्रेजी सेना से मोर्चा लिया। अपनी वीरता के बल पर ये कुछ समय के लिए लखनऊ को अंग्रेजों से मुक्त कराने में सफल रही , लेकिन जल्द ही अंग्रेजों ने लखनऊ पर फिर से अधिकार कर लिया। अंग्रेजों का सामना न कर पाने के कारण ये नेपाल चली गई और वहीं पर इनकी मृत्यु हो गई।
रानी लक्षमीबाई -- यह झाँसी के राजा गंगाधर राव की पत्नी थीं। 1853 में राजा गंगाधर राव की मौत हो गई थी। गंगाधर राव की मृत्यु के बाद रानी लक्षमीबाई ने एक बालक को गोद लिया था उस बालक का नाम दामोदर राव था। यह बालक की संरक्षिका बनकर स्वयं राज - काज देखने लगीं। तत्कालीन भारतीय गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी ने दामोदर राव को झाँसी का राजा स्वीकार नहीं किया और गोद निषेद के सिद्धांत के तहत झाँसी को व्रिटिश साम्राज्य का अंग बना लिया। रानी लक्षमीबाई ने प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अंग्रेजों को कड़ी टककर दी 1858 में यह लड़ते - लड़ते ग्वालियर के किले के बाहर वीरगति को प्राप्त हुई।
रानी अवन्तीबाई -- यह एक वीर , साहसी और निर्भीक महिला थीं। यह रामगढ़ मध्य्प्रदेश की रानी थी। अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने के लिए इन्होने एक सेना का गठन किया। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में इन्होने अंग्रेजों का डटकर मुकाबला किया। ये देश की रक्षा के लिए वीरगति को प्राप्त हुईं।
मंगल पाण्डे -- मंगल पाण्डे बैरकपुर बंगाल की ब्रिटिश छावनी में तैनात वीर सैनिक था। 29 मार्च 1857 को परेड के दौरान उसने चर्वी युक्त कारतूसों का प्रयोग करने से इनकार कर दिया। क्रोधित अंग्रेज अधिकारियों ने मंगल पाण्डे को हथियार डालने का आदेश दिया , तो इसने दो अंग्रेज अधिकारियों लेफ्टिनेण्ड बाग एवं लेफ्टिनेण्ट जनरल हुमस को गोली मारकर हत्या कर दी। अंग्रेजों ने 8 अप्रैल 1857 को मंगल पाण्डे को फाँसी की सजा दी। मंगल पाण्डे का यह बलिदान ही 1857 की क्रान्ति का तात्कालिक कारण बना।
बहादुरशाह जफर -- बहादुरशाह जफर भारत के अन्तिम मुगल सम्राट थे। 10 मई 1857 को मेरठ से क्रान्ति का सूत्रपात होने पर अगले दिन क्रन्तिकारी बड़ी संख्या में दिल्ली पहुँचे। क्रांतिकारियों ने इन्हे अपना नेता चुना। बहादुरशाह जफर की वीरता के कारण 3 माह तक अंग्रेज दिल्ली पर कब्जा नही कर सके। अंग्रेजों की कूटनीति के तहत बहादुरशाह जफर को बन्दी बनाकर रंगून बर्मा भेज दिया गया। रंगून में ही 1862 में बहादुरशाह जफर की मौत हो गई।
नाना साहब -- इनका वास्तविक नाम धोंडू पन्त था। ये मराठा पेशवा बाजीराव द्वितीय के दत्तक पुत्र थे। अंग्रेजों ने इन्हे 8 लाख रूपये की वार्षिक पेंशन देकर बिठूर भेज दिया था। लॉर्ड डलहौजी ने इनकी पेंशन भी बन्द कर दी। इससे भावनाओं का प्रचार - प्रसार किया। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में नाना साहब ने अंग्रेजों से कानपूर छीन लिया , लेकिन 6 दिसंबर 1857 को अंग्रेज कानपूर पर एक फिर कब्जा करने में सफल रहे।
कुँवर सिंह -- ये जगदीशपुर बिहार के राजा थे। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में कुँवर सिंह की बहादुरी के कारण अंग्रेजों को कई स्थानों पर शिकस्त मिली। ये छापामार युद्ध नीति में कुशल थे। 26 अप्रैल 1858 को कुँवर सिंह की मृत्यु हो गई।
तात्या टोपे -- ये एक सच्चे राष्ट्रभक्त और वीर सेनापति थे , इन्होने कई मोर्चों पर अंग्रेजी सेनाओं को पराजित किया। तात्या टोपे नाना साहब के प्रमुख सहयोगी थे। तात्या के एक विश्वासपात्र साथी की गददारी के कारण अंग्रेजों ने इन्हें बन्दी बनाकर 18 अप्रैल 1859 को उनकी हत्या कर दी।
वेगम हजरत महल -- इन्होने प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान लखनऊ में अंग्रेजी सेना से मोर्चा लिया। अपनी वीरता के बल पर ये कुछ समय के लिए लखनऊ को अंग्रेजों से मुक्त कराने में सफल रही , लेकिन जल्द ही अंग्रेजों ने लखनऊ पर फिर से अधिकार कर लिया। अंग्रेजों का सामना न कर पाने के कारण ये नेपाल चली गई और वहीं पर इनकी मृत्यु हो गई।
रानी लक्षमीबाई -- यह झाँसी के राजा गंगाधर राव की पत्नी थीं। 1853 में राजा गंगाधर राव की मौत हो गई थी। गंगाधर राव की मृत्यु के बाद रानी लक्षमीबाई ने एक बालक को गोद लिया था उस बालक का नाम दामोदर राव था। यह बालक की संरक्षिका बनकर स्वयं राज - काज देखने लगीं। तत्कालीन भारतीय गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी ने दामोदर राव को झाँसी का राजा स्वीकार नहीं किया और गोद निषेद के सिद्धांत के तहत झाँसी को व्रिटिश साम्राज्य का अंग बना लिया। रानी लक्षमीबाई ने प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अंग्रेजों को कड़ी टककर दी 1858 में यह लड़ते - लड़ते ग्वालियर के किले के बाहर वीरगति को प्राप्त हुई।
रानी अवन्तीबाई -- यह एक वीर , साहसी और निर्भीक महिला थीं। यह रामगढ़ मध्य्प्रदेश की रानी थी। अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने के लिए इन्होने एक सेना का गठन किया। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में इन्होने अंग्रेजों का डटकर मुकाबला किया। ये देश की रक्षा के लिए वीरगति को प्राप्त हुईं।
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