यूरोपीय शक्तियों का भारत में आगमन --

यूरोप का बाजारों में भारत में बने सूती कपड़ों और रेशम के अतिरिक्त मसालों की अधिक माँग थी। मसाला और कपड़ा बाजार पर कब्जा जमाने के उद्देश्य से यूरोपियन कम्पनियों का भारत में आगमन हुआ। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए सर्वपर्थम पुर्तगालियों ने भारत का रुख किया। उनके बाद डच , ब्रिटिश और फ्रांसीसी कम्पनियाँ भी भारत आई। बाजार पर एकाधिकार स्थापित करने और अधिक लाभ कमाने के उद्देश्य से इन कम्पनियों में प्रतिस्पर्द्धा शुरू हो गई , जिसके कारण कई युद्ध हुए। अन्त में ब्रिटिश कम्पनी भारतीय बाजार पर कब्जा जमाने में सफल रही। विभिन्न परिस्तितियों के कारण ब्रिटिश कम्पनी ने भारतीय राजनीति में भी दखल देना शुरू कर दिया था।  इसका परिणाम यह हुआ की वः भारत में सत्ता स्थापित करने में सफल रही और ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी व्यापार के साथ - साथ राजनीति का संचालन भी करने लगी।

भारत में पुर्तगालियों का उत्थान और पतन -- 20 मई 1498 को वास्कोडिगामा के भारत आगमन से पुर्तगालियों एवं भारत के मध्य व्यापार के क्षेत्र में एक नए युग का शुभारम्भ हुआ। धीरे - धीरे पुर्तगालियों का भारत आने का क्रम जारी हो गया।  9 मार्च 1500 को 13 जहाजों के एक बेड़े का नायक बनकर पेड्रो अल्वरेज केब्रल जल मार्ग द्वारा पुर्तगाल की राजधानी लिस्बन से भारत के लिए रवाना हुआ। उसके बाद 1503 में पुर्तगालियों ने भारत में सर्वपर्थम को चीन पर आधिपत्य स्थापित किया। कालीकट , गोवा , दमन , एवं दीव तथा हुगली के बन्दरगाहों में अपनी व्यापारिक कोठियाँ स्थापित की।

1505 तक पुर्तगालियों ने भारत में कई व्यापारिक कोठियाँ बना ली थीं। 1505 में फ्रांसिस्को डि अल्मीडा भारत में प्रथम पुर्तगाली गवर्नर बनकर आया और 1509 तक भारत में रहा। 1509 में अल्बुकर्क गवर्नर के रूप में भारत आया। उसने फारस की खाड़ी और लाल सागर में पुर्तगालियों का साम्राज्य बढ़ाया। उसने नील नदी की घाटी से होने वाले मुस्लिम व्यापार को समाप्त करने के लिए उरमूज में किले का निर्माण कराया। 1510 में उसने गोवा पर अधिकार कर लिया। अल्बुकर्क ने गोवा को भारत में पुर्तगाली क्षेत्रों की राजधानी बनाया। अल्बुकर्क ने दक्षिण - पूर्व एशिया मलक्का तक पुर्तगाल साम्राज्य को फैला दिया। अल्बुकर्क 1515 तक भारत में वायसराय रहा। अल्बुकर्क ही भारत में पुर्तगाली साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक था। उसके बाद भी पुर्तगाली साम्राज्य का विस्तार होता रहा। 1518 में लंका के समुद्री किनारे के अनेक प्रदेश 1534 में भारत में बसीन 1537 में दीव व् 1538 में दमन भी पुर्तगाली साम्राज्य का अंग बन गए। धीरे - धीरे भारत का सम्पूर्ण विदेशी व्यापार पुर्तगालियों के कब्जे में चला गया।

पुर्तगालियों ने लगभग 100 वर्षों तक पूर्वी देशों के साथ व्यापार किया , लेकिन पुर्तगाली इस साम्राज्य को लम्बे समय तक न सम्भाल सके। उनकी नीतियाँ ही उनके पतन का कारण बनीं। पुर्तगालियों की धार्मिक नीतियों के विरोध में शाहजहाँ ने उनसे हुगली छीन लिया। मराठों ने भी सालसित तथा बसीन पर कब्जा कर लिया। पुर्तगालियों का साम्राज्य आख़िरकार गोवा , दमन एवं दीव तक ही सिमटकर रह गया।

















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