भारत में ब्रिटिश शक्ति का उदय और विकास --
31 दिसंबर 1600 को इग्लैण्ड के कुछ व्यापारियों ने पूर्वी देशों के साथ व्यापार करने के उद्देश्य से ईस्ट इण्डिया कम्पनी की स्थापना की। इस कम्पनी का वास्तविक नाम द गवर्नर एण्ड कम्पनी ऑफ मर्चेण्ट्स ऑफ लन्दन ट्रेडिंग इंटू द ईस्ट इण्डीज था। प्रारम्भ में इग्लैण्ड की महारानी एलिजाबेथ प्रथम ने इस कम्पनी को पूर्वी देशों के साथ व्यापार करने के लिए विशेषाधिकार प्रदान किया। इस विशेषाधिकार की अवधि 15 वर्ष थी।
1615 में इग्लैण्ड के राजा जेम्स प्रथम ने सर टॉमस रॉ को अपने राजदूत के रूप में जहाँगीर के दरवार में भेजा हालाँकि सर टॉमस रो और जहाँगीर के बीच व्यापारिक समझौता नहीं हो सका , लेकिन टॉमस रो गुजरात के तत्कालीन सूबेदार खुर्रम शाहजहाँ से व्यापारिक कोठियाँ खोलने का फरमान प्राप्त करने ने सफल रहा। धीरे - धीरे सूरत अंग्रेजों का प्रमुख व्यापारिक केन्द्र बन गया।
ब्रिटिश शक्ति का विकास -- भारत में 1611 से 1680 तक ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी का तेजी से विस्तार हुआ। गोलकुण्डा के सन्तुलन की आज्ञा से 1611 में अंग्रेजों ने मछलीपटट्म में व्यापारिक कोठी स्थापित की। 1626 में अंग्रेजों ने आरमगाओ बाजार में व्यापारिक कोठियों की स्थापना की। 1660 से 1680 तक का समय ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी के लिए आर्थिक रूप से स्वर्णकाल रहा। इस दौरान अंग्रेजों का प्रमुख व्ययापारिक केन्द्र सूरत के स्थान पर बम्बई हो गया।
औरंगजेब से संघर्ष -- ब्रिटिश व्यापार का भारत में विस्तार होने पर ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अधिकारीयों ने शक्ति एवं बल प्रयोग की नीति अपनाना शुरू कर दिया। 1688 में अंग्रेजों ने हुगली नगर को लूट लिया और मक्का जाने वाले यात्रीयों के जहाजों को घेर लिया। इस पर मुगल बादशाह औरंगजेब ने अंग्ग्रेजों के प्रति कड़ा रुख अपनाया। औरंगजेब के आदेश पर शाइस्ता खां ने अंग्रेजों की सूरत , पटना , कासिम बाजार और मछलीपटट्म की व्यापारिक कोठियों पर कब्जा कर लिया। आख़िरकार अंग्रेजों को मुगल सम्राट औरंगजेब से सन्धि करनी पड़ी। सन्धि की शर्तों के तहत अंग्रेजों ने मुगल सम्राट को युद्ध की क्षतिपूर्ति दी और बदले में उन्हें अपने व्यापारी स्थान वापस मिल गए।
अंग्रेजों ने 1691 में बंगाल में भी व्यापार करने का अधिकार प्राप्त कर लिया। कोलकता अंग्रेजों का प्रमुख व्यापारिक केन्द्र बन गया। धीरे - धीरे हैदराबाद और गुजरात तक अंग्रेजों के व्यापारिक नगर बन गए। 18 वीं शताब्दी के प्रारम्भ में अंग्रेजों ने पुर्तगालियों और डचों को परास्त कर अपनी व्यापारिक प्रभुसत्ता स्थापित कर ली। अब अंग्रेजों के सामने प्रमुख विदेशी प्रतिध्वन्धी के रूप में फ्रांसीसी ही शेष बचे थे। इस प्रकार 18 वीं शताब्दी के प्रारम्भ में ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी एक शक्तिशाली व्यापारिक संस्था बन गई थी।
31 दिसंबर 1600 को इग्लैण्ड के कुछ व्यापारियों ने पूर्वी देशों के साथ व्यापार करने के उद्देश्य से ईस्ट इण्डिया कम्पनी की स्थापना की। इस कम्पनी का वास्तविक नाम द गवर्नर एण्ड कम्पनी ऑफ मर्चेण्ट्स ऑफ लन्दन ट्रेडिंग इंटू द ईस्ट इण्डीज था। प्रारम्भ में इग्लैण्ड की महारानी एलिजाबेथ प्रथम ने इस कम्पनी को पूर्वी देशों के साथ व्यापार करने के लिए विशेषाधिकार प्रदान किया। इस विशेषाधिकार की अवधि 15 वर्ष थी।
1615 में इग्लैण्ड के राजा जेम्स प्रथम ने सर टॉमस रॉ को अपने राजदूत के रूप में जहाँगीर के दरवार में भेजा हालाँकि सर टॉमस रो और जहाँगीर के बीच व्यापारिक समझौता नहीं हो सका , लेकिन टॉमस रो गुजरात के तत्कालीन सूबेदार खुर्रम शाहजहाँ से व्यापारिक कोठियाँ खोलने का फरमान प्राप्त करने ने सफल रहा। धीरे - धीरे सूरत अंग्रेजों का प्रमुख व्यापारिक केन्द्र बन गया।
ब्रिटिश शक्ति का विकास -- भारत में 1611 से 1680 तक ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी का तेजी से विस्तार हुआ। गोलकुण्डा के सन्तुलन की आज्ञा से 1611 में अंग्रेजों ने मछलीपटट्म में व्यापारिक कोठी स्थापित की। 1626 में अंग्रेजों ने आरमगाओ बाजार में व्यापारिक कोठियों की स्थापना की। 1660 से 1680 तक का समय ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी के लिए आर्थिक रूप से स्वर्णकाल रहा। इस दौरान अंग्रेजों का प्रमुख व्ययापारिक केन्द्र सूरत के स्थान पर बम्बई हो गया।
औरंगजेब से संघर्ष -- ब्रिटिश व्यापार का भारत में विस्तार होने पर ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अधिकारीयों ने शक्ति एवं बल प्रयोग की नीति अपनाना शुरू कर दिया। 1688 में अंग्रेजों ने हुगली नगर को लूट लिया और मक्का जाने वाले यात्रीयों के जहाजों को घेर लिया। इस पर मुगल बादशाह औरंगजेब ने अंग्ग्रेजों के प्रति कड़ा रुख अपनाया। औरंगजेब के आदेश पर शाइस्ता खां ने अंग्रेजों की सूरत , पटना , कासिम बाजार और मछलीपटट्म की व्यापारिक कोठियों पर कब्जा कर लिया। आख़िरकार अंग्रेजों को मुगल सम्राट औरंगजेब से सन्धि करनी पड़ी। सन्धि की शर्तों के तहत अंग्रेजों ने मुगल सम्राट को युद्ध की क्षतिपूर्ति दी और बदले में उन्हें अपने व्यापारी स्थान वापस मिल गए।
अंग्रेजों ने 1691 में बंगाल में भी व्यापार करने का अधिकार प्राप्त कर लिया। कोलकता अंग्रेजों का प्रमुख व्यापारिक केन्द्र बन गया। धीरे - धीरे हैदराबाद और गुजरात तक अंग्रेजों के व्यापारिक नगर बन गए। 18 वीं शताब्दी के प्रारम्भ में अंग्रेजों ने पुर्तगालियों और डचों को परास्त कर अपनी व्यापारिक प्रभुसत्ता स्थापित कर ली। अब अंग्रेजों के सामने प्रमुख विदेशी प्रतिध्वन्धी के रूप में फ्रांसीसी ही शेष बचे थे। इस प्रकार 18 वीं शताब्दी के प्रारम्भ में ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी एक शक्तिशाली व्यापारिक संस्था बन गई थी।
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