प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की पृष्ठभूमि --

1757 के प्लासी के युद्ध और 1764 के बक्सर के युद्ध के बाद भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना हुई। साम्राज्य स्थापित होने के बाद से ही ब्रिटिश अधिकारियों ने दमनकारी और अत्याचारी नीतियाँ शुरू कर दी। भारतीय जनमानस ब्रिटिशों की इस शोषणकारी नीतियों से त्रस्त हो चूका था , जिसका परिणाम 1857 के विद्रोह के रूप में सामने आया। भारतीयों की ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ स्वतंत्रता के लिए यह पहली लड़ाई थी , जिसे प्रथम स्वतंत्रता संग्राम कहा जाता है। अंग्रेजों ने इसे स्वतंत्र्रता संग्राम के स्थान पर सैनिक विद्रोह की संज्ञा दी है। 1857 की इस क्रान्ति का परिणाम यह हुआ की भारत से ईस्ट इण्डिया कम्पनी का शासन समाप्त हो गया और भारत  शासन व्यवस्था ब्रिटिश क्राउन के हाथों में चली गई। यह वर्ष इतिहास का एक युग - प्रवर्तक वर्ष था।

1857 की क्रान्ति के कारण --

अंग्रेजों की राजनितिक , धार्मिक , सैनिक तथा आर्थिक नीतियों के कारण ही 1857 की क्रान्ति हुई।

राजनीतिक कारण -- 

साम्राज्य्वादी नीति -- अंग्रेज भारत में व्यापार करने के उद्देश्य से आए थे , लेकिन यहाँ उन्होंने अपने साम्राज्य का विस्तार करना आरम्भ कर दिया। साम्राज्य विस्तार के उद्देश्य की पूर्ति के लिए ब्रिटिश अधिकारियों ने कूटनीति का सहारा लिया। लार्ड डलहौजी ने साम्राजयवादी नीति को सफल बनाने के लिए गोद निषेध जैसे सिद्धान्त चलाए। हैदरावाद , मैसूर , तंजौर , अवध , कर्नाटक , जयपुर , जोधपुर , बड़ौदा , इंदौर तथा ग्वालियर आदि साम्राज्य अंग्रेजों के कब्जे में जा चुके थे। इस साम्राजयवादी विचारधारा के कारण भारतीय जनमानस अंग्रेजों को शत्रु मानने लगा।

भारतीय शासकों का अपमान -- मुगल साम्राज्य की शक्ति क्षीण होने के बाद भी भारतीय जनमानस में मुगल सम्राट बहादुरशाह के प्रति सम्मान की भावना व्याप्त थी। भारत में अपने साम्राज्य की स्थिति मजबूत होने के साथ ही ब्रिटिश अधिकारी उनका अपमान करने लगे थे। 1835 में मद्राओं पर मुगल सम्राट का नाम अंकित होना बन्द हो गया था। अंग्रेजों ने बाजीराव पेशवा द्वितीय के दत्तक पुत्र नाना साहेब की पेंशन भी बन्द कर दी गई थी तथा उनकी सम्मानसूचक उपाधि भी वापस ले ली गई थी। इससे स्थानीय जनता अंग्रेजों से घृणा करने लगी।

उच्च पदों से भारतियों को वंचित करना -- भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के दौरान अधिकांश उच्च पदों पर अंग्रेज ही तैनात थे। उच्च शिक्षित भारतीय भी क्लर्क जैसे अधीनस्थ पदों पर कार्य करते थे। अंग्रेज भारतियों को हीन भावना से देखते थे। 1835 में विलियम बेन्टिंक के वापस जाने के बाद भारतियों की पुनः उपेक्षा शुरू हो गई। 1857 में थाँमस मुनरो ने भारतीयों को उच्च पदों पर नियुक्त किए जाने की पार्थना की , लेकिन इस पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। ब्रिटिश अधिकारियों के इस दुर्व्यवहार से भारतीय जनमानस में रोष पनपने लगा।

राज्य अपहरण की नीति -- भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी 1848 - 56 साम्राजयवादी नीति के उद्देश्य की पूर्ति के लिए एक नवीव सिद्धान्त बनाया , जिसे इतिहास में राज्य हड़पने का सिद्धान्त या राज्य अपहरण की नीति के नाम से जाना जाता है। इस नीति के तहत सन्तानहीन भारतीय शासक सन्तान गोद नहीं ले सकते थे। इसके लिए ब्रिटिश सरकार की अनुमति लेनी आवश्यक थी। डलहौजी ने इसी नीति द्वारा सतारा , झॉंसी , नागपुर , सम्भल , उदयपुर और बघात को ब्रिटिश साम्राज्य का अंग बना लिया।

दोषपूर्ण न्याय - प्रणाली -- कम्पनी की न्याय - प्रणाली अत्यन्त दोषपूर्ण , जटिल , खर्चीला एवं भेदभावपूर्ण थी , जिसमे हमेशा अंग्रेजों का ही पक्ष लिया जाता था। इससे भारतीयों को पूर्ण न्याय प्राप्त नहीं होता था। इस न्याय - प्रणाली ने भारतीयों के असन्तोष में और वृद्धि की।

अवध का विलय -- अवध के नवाब भी ब्रिटिश कम्पनी की साम्राज्य विस्तार नीति का शिकार हुए। अंग्रेजों ने 13 फरवरी 1856 को नबाव वाजिद अली शाह पर कुशासन का आरोप लगाकर अवध को भी ब्रिटिश साम्राज्य का हिसाब बना लिया , जबकि अवध के नवाब अंग्रेजों के प्रति वफादार थे। इससे भारतीय जनमानस यह समझने लगा था कि अंग्रेजों के प्रति वफादारी रखने से कोई लाभ नहीं होगा।








































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