प्रथम स्वाधीनता संग्राम की असफलता के कारण --
प्रथम स्वाधीनता संग्राम के दौरान क्रांतिकारियों ने वीरता , साहस और उत्साह के बल पर अंग्रेजों के दाँत खट्टे कर दिए थे , लेकिन कूटनीति और षड्यंत्र के बल पर अंग्रेज इस आन्दोलन को दबाने में सफल रहे।
समय से पूर्व क्रान्ति की शुरुआत -- अंग्रेजी साम्राज्य के विरुद्ध विद्रोह के लिए 31 मई 1857 की तिथि निश्चित की गई थी , लेकिन चर्बी वाले कारतूस की घटना के कारण 10 मई 1857 को मेरठ में विद्रोह हो गया। विद्रोह की यह आग देश के अन्य हिस्सों में धीरे - धीरे फैली। यदि यह विद्रोह पुरे देश में एक ही तिथि को होता , तो अंग्रेजों के लिए इसका दमन करना सम्भव नही था।
कुशल नेतृत्व का आभाव -- क्रांतिकारियों ने वीरता और साहस का परिचय देते हुए प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों से कड़ा मुकाबला किया था , लेकिन उनमे योग्य नेतृत्व का आभाव था। बहादुरशाह जफर बुजुर्ग होने के कारण युद्ध - क्षेत्र में जाने में असमर्थ थे। नाना साहब ने भी दूरदर्शिता का आभाव था। इसके विपरीत अंग्रेजी सेना में नील , आउटरम , हूरोज , निकलसन , कैंपबेल जैसे योग्य सेनापति थे।
उचित संगठन व् योजना का आभाव -- 1857 में मुख्य रूप से उत्तर भारत में फैला यह विद्रोह न तो संगठित था और न ही पूर्व नियोजित तथा विद्रोह के पीछे कोई केन्द्रीय शक्ति भी नहीं थी। विद्रोह के पीछे विभिन्न नेताओं के अपने - अपने स्वार्थ निहित थे। विद्रोही एक भीड़ के समान थे , उन्होंने संगठित होकर शत्रु का सामना नहीं किया। वहीं अंग्रेज योग्य दूरदर्शी एवं समझदार थे।
पंजाब के सिखों व् नेपाल के गोरखों द्वारा अंग्रेजों को सहायता -- विद्रोह को सभी वर्गों का सहयोग और समर्थन नहीं मिला , पंजाब के सिखों तथा नेपाल के गोरखों ने ब्रिटिश शासन का पक्ष लिया। पंजाब के सिख हेनरी लारेन्स तथा जॉन लॉरेन्स द्वारा किए गए सुधारों से प्सन्न थे , साथ ही वे मुगल बादशाहों से घृणा करते थे। इसी प्रकार नेपाल के गोरखों तथा काबुल के शासक दोस्त मोहम्मद खाँ ने भी क्रान्तिकारियों के विरुद्ध अंग्रेजों का साथ दिया।
एक लक्षय का आभाव -- विद्रोह में शामिल सभी लोगों के अपने निजी स्वार्थ थे। हिन्दू मराठा हिन्दू साम्राज्य तथा मुस्लिम विद्रोही मुस्लिम साम्राज्य की स्थापना करना चाहते थे। एक लक्षय का आभाव होने के कारण वे संगठित न हो सके।
विद्रोह का सिमित क्षेत्र -- यह आन्दोलन उत्तर भारत के कुछ क्षेत्रों तक ही सीमित रहा। नेपाल के गोरखे , पंजाब के सिख , राजपूत , मराठा सरदार होल्कर तथा हैदराबाद के निजाम आदि भी इस संग्राम से दूर रहे। सिन्ध और राजस्थान ने भी असहयोग नीति अपनाई। यदि राष्ट्रिय स्तर पर संगठित होकर यह विद्रोह होता तो सम्भवतः अंग्रेजों को पराजय का सामना करना पड़ता।
अस्त्र - शस्त्रों का आभाव -- क्रान्तिकारियों के पास सिमित मात्रा में प्राचीन हथियार मौजूद थे , इसके विपरीत अंग्रेजों के पास खाद्य सामग्री , गोला - बारूद और आधुनिक हथियार थे। क्रन्तिकारी इन आधुनिक हथियारों का अधिक समय तक मुकाबला न कर सके।
राष्ट्रीयता की भावना की कमी -- प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का स्वरूप राष्ट्रिय नहीं था। भारत के कई राजाओं ने विद्रोह को दबाने के लिए अंग्रेजों का साथ दिया। पटियाला , जीन्द , ग्वालियर , हैदराबाद और बड़ौदा के शासकों ने अंग्रेजों को आर्थिक और सैनिक सहायता प्रदान की।
अन्य कारण --
शिक्षित भारतीय वर्ग का आन्दोलन से दूरी बनाए रखना -- शिक्षित भारतियों द्वारा विद्रोहियों का साथ न देकर ब्रिटिश राज का साथ देना भी विद्रोहियों की असफलता का एक कारण माना जाता है। शिक्षित भारतीयों ने स्वयं को विद्रोह से अलग रखा।
ब्रिटिश कूटनीति -- अंग्रेजों ने भारतियों को अपनी संगठित एवं कुशल कूटनीतिक चालों से परस्पर एक नहीं होने दिया। उन्होंने हिन्दुओं तथा मुसलमानों के बीच मतभेद पैदा किए और अपनी कूटनीति के बल पर राजपूतों , मराठों , सिखों , गोरखों , अफगानों आदि को अपनी ओर मिला लिया , जबकि दूसरी ओर भारतीय विद्रोही कूटनीतिक स्तर पर अंग्रेजों का मुकाबला करने में असफल रहे।
प्रथम स्वाधीनता संग्राम के दौरान क्रांतिकारियों ने वीरता , साहस और उत्साह के बल पर अंग्रेजों के दाँत खट्टे कर दिए थे , लेकिन कूटनीति और षड्यंत्र के बल पर अंग्रेज इस आन्दोलन को दबाने में सफल रहे।
समय से पूर्व क्रान्ति की शुरुआत -- अंग्रेजी साम्राज्य के विरुद्ध विद्रोह के लिए 31 मई 1857 की तिथि निश्चित की गई थी , लेकिन चर्बी वाले कारतूस की घटना के कारण 10 मई 1857 को मेरठ में विद्रोह हो गया। विद्रोह की यह आग देश के अन्य हिस्सों में धीरे - धीरे फैली। यदि यह विद्रोह पुरे देश में एक ही तिथि को होता , तो अंग्रेजों के लिए इसका दमन करना सम्भव नही था।
कुशल नेतृत्व का आभाव -- क्रांतिकारियों ने वीरता और साहस का परिचय देते हुए प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों से कड़ा मुकाबला किया था , लेकिन उनमे योग्य नेतृत्व का आभाव था। बहादुरशाह जफर बुजुर्ग होने के कारण युद्ध - क्षेत्र में जाने में असमर्थ थे। नाना साहब ने भी दूरदर्शिता का आभाव था। इसके विपरीत अंग्रेजी सेना में नील , आउटरम , हूरोज , निकलसन , कैंपबेल जैसे योग्य सेनापति थे।
उचित संगठन व् योजना का आभाव -- 1857 में मुख्य रूप से उत्तर भारत में फैला यह विद्रोह न तो संगठित था और न ही पूर्व नियोजित तथा विद्रोह के पीछे कोई केन्द्रीय शक्ति भी नहीं थी। विद्रोह के पीछे विभिन्न नेताओं के अपने - अपने स्वार्थ निहित थे। विद्रोही एक भीड़ के समान थे , उन्होंने संगठित होकर शत्रु का सामना नहीं किया। वहीं अंग्रेज योग्य दूरदर्शी एवं समझदार थे।
पंजाब के सिखों व् नेपाल के गोरखों द्वारा अंग्रेजों को सहायता -- विद्रोह को सभी वर्गों का सहयोग और समर्थन नहीं मिला , पंजाब के सिखों तथा नेपाल के गोरखों ने ब्रिटिश शासन का पक्ष लिया। पंजाब के सिख हेनरी लारेन्स तथा जॉन लॉरेन्स द्वारा किए गए सुधारों से प्सन्न थे , साथ ही वे मुगल बादशाहों से घृणा करते थे। इसी प्रकार नेपाल के गोरखों तथा काबुल के शासक दोस्त मोहम्मद खाँ ने भी क्रान्तिकारियों के विरुद्ध अंग्रेजों का साथ दिया।
एक लक्षय का आभाव -- विद्रोह में शामिल सभी लोगों के अपने निजी स्वार्थ थे। हिन्दू मराठा हिन्दू साम्राज्य तथा मुस्लिम विद्रोही मुस्लिम साम्राज्य की स्थापना करना चाहते थे। एक लक्षय का आभाव होने के कारण वे संगठित न हो सके।
विद्रोह का सिमित क्षेत्र -- यह आन्दोलन उत्तर भारत के कुछ क्षेत्रों तक ही सीमित रहा। नेपाल के गोरखे , पंजाब के सिख , राजपूत , मराठा सरदार होल्कर तथा हैदराबाद के निजाम आदि भी इस संग्राम से दूर रहे। सिन्ध और राजस्थान ने भी असहयोग नीति अपनाई। यदि राष्ट्रिय स्तर पर संगठित होकर यह विद्रोह होता तो सम्भवतः अंग्रेजों को पराजय का सामना करना पड़ता।
अस्त्र - शस्त्रों का आभाव -- क्रान्तिकारियों के पास सिमित मात्रा में प्राचीन हथियार मौजूद थे , इसके विपरीत अंग्रेजों के पास खाद्य सामग्री , गोला - बारूद और आधुनिक हथियार थे। क्रन्तिकारी इन आधुनिक हथियारों का अधिक समय तक मुकाबला न कर सके।
राष्ट्रीयता की भावना की कमी -- प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का स्वरूप राष्ट्रिय नहीं था। भारत के कई राजाओं ने विद्रोह को दबाने के लिए अंग्रेजों का साथ दिया। पटियाला , जीन्द , ग्वालियर , हैदराबाद और बड़ौदा के शासकों ने अंग्रेजों को आर्थिक और सैनिक सहायता प्रदान की।
अन्य कारण --
शिक्षित भारतीय वर्ग का आन्दोलन से दूरी बनाए रखना -- शिक्षित भारतियों द्वारा विद्रोहियों का साथ न देकर ब्रिटिश राज का साथ देना भी विद्रोहियों की असफलता का एक कारण माना जाता है। शिक्षित भारतीयों ने स्वयं को विद्रोह से अलग रखा।
ब्रिटिश कूटनीति -- अंग्रेजों ने भारतियों को अपनी संगठित एवं कुशल कूटनीतिक चालों से परस्पर एक नहीं होने दिया। उन्होंने हिन्दुओं तथा मुसलमानों के बीच मतभेद पैदा किए और अपनी कूटनीति के बल पर राजपूतों , मराठों , सिखों , गोरखों , अफगानों आदि को अपनी ओर मिला लिया , जबकि दूसरी ओर भारतीय विद्रोही कूटनीतिक स्तर पर अंग्रेजों का मुकाबला करने में असफल रहे।
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