प्रत्यक्ष कर

प्रत्यक्ष कर 


             प्रत्यक्ष क्र उन करों को कहा जाता है , जिनका भार उन लोगों को प्रत्यक्ष रूप से वहन करना पड़ता है , जिन पर ये आरोपित किए हे है। ये क्र उस व्यक्ति या व्यवसाय द्वारा सरकार को प्रत्यक्ष रूप से अदा किए जाते है जिस पर ये लगाए जाते है। आयकर , निगम कर और भूमि क्र प्रत्यक्ष कर हैं। 

प्रत्यक्ष कर की परिभषाएँ 

              एनातोल मुराद के अनुसार , प्रत्यक्ष कर वे कर होते हैं जिनका विवर्तन नहीं किया जा सकता , इसलिए उनका भार प्रत्यक्ष रूप से उसी व्यक्ति पर पड़ता है , जिससे सरकार कर वसूल करती है। 

वेस्टबेल के अनुसार प्रत्यक्ष कर वे कर होते है , जो स्थायी तथा बार - बार उतपन्न होने वाले अवसरों पर लगाए जाते हैं। 

प्रत्यक्ष करों के गुण 

              निश्चित कर -- कर चुकाने वाले व्यक्ति को पहले से ही ज्ञात होता है , की उसे कितना कर कब चुकाना है।  अतः इस क्र में निश्चितता की स्थिति है। 

             प्रगतिशील कर -- करों को इस प्रकार लगाया जात्ता हां की इनका प्रभाव अमीर लोगों पर अधिक तथा ग्रीव लोगों पर कम पड़े , ये करदाता की क्षमता के आधार पर लगाए जाते हैं। 

             लोचदार -- इन  करों की दर को आवश्यकतानुसार सरकार घटा -  बढ़ा सकती है। 

          उत्पादकता की दृष्टि से -- अगर सरकार द्वारा इन करों की दर में थोड़ी भी वृद्धि कर दी जाती है , तो सरकार को बहुत अधिक आय प्राप्त होती है। 

           सरकार के व्यय में कमी -- इन करों  प्राप्त करने के लिए सरकार को अधिक व्यय नहीं करना पड़ता , करदाता स्वयं जाकर कर का भुगतान करता है।  अतः सरकार के व्यय में कमी आती है। 

            सुविधा की दृष्टि से -- जब व्यक्ति के पास कर का भुगतान करने के लिए धन होता है , उसी समय उनसे क्र लिया जाता है जैसे - वेतन पाने वाले से वेतन मिलने के समय। 

प्रत्यक्ष करों के दोष --

              खर्च के आधार पर -- प्रत्यक्ष करों को एकत्रित करना प्रायः अत्यधिक खर्चीला होता है , क्योकि इनको एकत्रित करने के लिए बहुत अधिक संख्या में कर्मचारी व् प्रशासनिक अधिकारी नियुक्त किए जाते हैं। 

            लोगों की अप्रियता -- इन करों के प्रति लोगों में अप्रियता विद्यमान है , क्योकि इनका भुगतान प्रत्यक्ष रूप से करदाता द्वारा किया जाता है। 

          भुगतान के समबन्ध में परेशानी -- आय - व्यय का हिसाब लगाना ,,, आयकर विभाग के चककर काटना आदि अनेक परेशानियाँ होने से करदाता को कष्ट होता है। 

             करों की चोरी -- करदाता अपनी सुचनाऔ में सही न बताकर या जानकारी छुपाकर कर की चोरी भी कर लेते हैं। इन सबके कारण ईमानदारी क्र दाताओं को हानि होती है व् भ्र्ष्टाचार को बढ़ावा मिलता है। 

            बचत का प्रभावित होना -- इस प्रकार के करों की ऊंची दर होने के कारण बचत प्रभावित होती है। जिससे उत्पादन क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है व् विनियोग निवेश की क्षमता कम हो जाती है। 

             विदेशी पूँजी पर प्रभाव --  जब किसी देश में प्रत्यक्ष  कर   की दर  उच्च होती है , तो बाहर के लोग उस देश में अपनी पूँजी का निवेश नहीं करना चाहते है , जिससे देश में विदेशी पूँजी की कमी होने लगती है और देश के आर्थिक विकास पर प्रभाव पड़ता है। 

             सिमित क्षेत्र -- सामान्य रूप से प्रत्यक्ष कर उन्ही व्यक्तियों पर लगाए जाते है , जो आर्थिक दृष्टि से संम्पन्न होते हैं।  अतः सिमित क्षेत्र के कारण यी सरकर को पर्याप्त आय नहीं प्रदान क्र पाते।    


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