DROUGHT - सूखा
सूखा -
लम्बी अबधि तक किसी स्थान पर अपेक्षित तथा सामान्य वर्षा से काफी कम वर्षा वार्षिक वर्षा के 75 % से कम होना सूखे की आपदा के रूप में जाना जाता है। यह एक मौसम संबन्धी आपदा है। दूसरे शब्दों में कृषि , पशु धन , उद्योग एवं मानव संसाधन की आवश्यकताओ से कम जल उपजब्ध होने की स्थिति को सूखा कहा जाता है
अत्यधिक सूखा प्रभावित क्षेत्र --
इस प्रकार का अधिकांश क्षेत्र अरावली पर्वत के पश्चिमी में स्थित राजिस्थान के मरुस्थल एवं कच्छ क्षेत्र है जहां अत्यधिक सूखा पड़ता है। इसमें राजिस्थान के बाड़मेड और जैसलमेर जिले सम्मलित है।
अधिक सूखा प्रभावित क्षेत्र --
सूखा प्रभावित क्षेत्र के इस वर्ग में राजिस्थान का पूर्वी ,भाग , मध्यप्रदेश का अधिकांश भाग , महाराष्ट्र का पूर्वी भाग , आन्ध्रप्रदेश का आंतरिक भाग , कर्नाटक का पठार , तमिलनायडु का उत्तरी भाग , झारखण्ड का दक्षिण भाग और ओडिसा का आंतरिक भाग सम्मलित है।
मध्यम सूखा प्रभावित क्षेत्र --
सूखा प्रभावित क्षेत्र के इस वर्ग में राजिस्थान का उत्तरीय भाग , हरियाणा व् उत्तरप्रदेश के दक्षिणी जिले , गुजरात के बचे कुछ भाग के जिले , कोंकड़ को छोड़ कर महाराष्ट्र , झारखण्ड , तमिलनायडु में कोयंबटूर पठार और आंतरिक कर्नाटक सम्मलित है
सूखे के कारण --
अत्यधिक चराई व् कटाई के कारण हरियाली कम हो जाती है , जिसके फलस्वरूप वर्षा कम मात्रा में होती है और यदि होती भी है तो जल तेजी से भू - तल में चला जाता है
भूमिगत जल का अत्यधिक दोहन भी सूखे का कारण है। जब भूमिगत जल निकासी दर , उसकी रिचार्ज दर से अधिक होती है , तो भीमीगत जल भंडार में कमी आ जाता है।
आधुनिक विकास के कारण जल - चक्र प्रभावित हुआ है , जिसके फलस्वरूप वर्षा का आभाव हो जाता है
नदियों पर बांध बनाने के लिए नदियों का मार्ग परिवर्तन भी सूखे का कारण है नदियों का मार्ग परिवर्तन होने से निटकवर्ती भूमिगत जलश्रोत सूखने लगते है।
अत्यधिक खनन भी सूखे का कारण है चट्टानें भूमिगत जल को एकत्रित करने में सहायक होती है। इनका खनन करने पर वर्षा का जल तेजी से वह जाता है , जिससे भूमिगत श्रोतों को जल नहीं मिल पता और वे सुख जाते है।
सूखे के दुष्प्रभाव --
कृषि के अंतर्गत सूखे के कारण फसलों की बुबाई नहीं हो पति है। इससे कृषि उत्पादन घटता है , जिससे सकल घरेलू उत्पाद एवं खद्यान की कमी की समस्या उत्तपन्न होती है।
भारत की लगभग 60 % श्रम शक्ति अपनी आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर करती है। सूखे की स्थिति में ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी बढ़ जाती है। इससे छोटे किसान एवं कृषि मजदूर भुखमरी का शिकार होने लगते है।
सुद्ध जल की उपलब्धता में कमी आने से कई जल जनित संकार्मक बीमारियां होती है जैसे - हैजा हेपेटाइटस आदि।
सूखे की स्थिति सम्पूर्ण देश की अर्थव्यवस्था में अस्थिरिता उत्तपन्न।
भारत में कृषि द्वारा पशुओं के लिए चारा उपलब्ध करने का कार्य भी किया जाता है।
सूखे के प्रभाव के कारण पशुओं के लिए चारे की समस्या उत्तपन्न होती है , क्योकि चारे की उपज के लिए मृदा को पर्याप्त मात्रा में नमि की जरूरत होती है।
सूखा आपदा का प्रबन्ध - बचाब -- सूखे का सबसे बड़ा कारण वर्षा का आभाव है , जिसके कारण फसलें सुख जाती है। सूखे की समस्या के लिए निमन उपाय किये जाते है ,
जल का उपयोग सिचाई के लिए आवश्यक है। अतः जल का उचित प्रबंधन करके सिचाई तंत्र का विकास किया जा सकता है।
देश की प्रमुख नदियों के बेशिन आपस में जोड़कर नदियों का एक ग्रिड तैयार किया जा सकता है , जिससे शुष्क तथा अनावृष्टि वाले क्षेत्रों में जल की आपूर्ति होती रहे।
वृक्षों की अन्धाधुंध कटाई को रोककर सूखा प्रभावित क्षेत्रों में सामाजिक वानिकी तथा स्थयी हरित जैसे कर्यक्रमों को प्रोत्साहित किया जाना चहिये।
नदियों के ऊपरी अपवाह क्षेत्र में बांध बनाकर पानी को ब्यर्थ बहने से बचाया जाये।
हरित पट्टी का विस्तार किया जाये क्योकि वृक्ष पर्यवरण की शुद्धता बनाए रखते है।
शुष्क व् अर्द्ध - शुष्क प्रदेशों में शुष्क भूमि कृषि प्रणाली , टपकन सिचाई आदि की व्यवस्था द्वारा सूखे से बचाब किया जा सकता है।
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