गुरु क्या है

गुरु पूर्णिमा ,  हमारे जीवन में गुरु का महत्व 

      गरु बिन घोर अंधार , गुरु बिन समझ न आवे। 
      गरु बिन श्रुति  न शुद्ध , गरु बिन मुक्ति न पावे।।
      
       गुरु कर सच विचार , गरु  कर रे मन मेरे। 
       गुरु का सवध सपन , औगन कटें सब तेरे ।। 

                  गुरु ग्रंथ में गुरु की महिमा को सर्वोपर माना है , हम लोग अध्यात्मक जगत में प्रवेश करते है।  सम्पूर्ण भारत में गुरु पूर्णिमा का पर्व आषाढ़ मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है।  इस दिन गुरु वेद व्यास जी का जन्म हुआ था।  गुरु  की  रोशनी  के  बिना  सब  अँधियारा ही अँधियारा है।  

                    गुरु चाँद की तरह है और शिष्य का जीवन अमावश्या की तरह। चाँद से रोशनी आती है तभी हमे अंधेरी रात में दिखाई पड़ता है।  इसी तरह मनुष्य में पांच ज्ञाननेन्द्रया है। जो शब्द, श्पर्श, रूप, रस, गंध, का ज्ञान करती है।  ये सभी इन्द्रिया बाहर की तरफ अर्थात जगत का ज्ञान करती है।  परन्तु अंदर  ज्ञान , अंदर का दर्शन अथवा आत्म ज्ञान हम बिना गुरु कृपा के नहीं कर सकते। बहरमुखी इंद्रिया अंतर् मुखी नहीं हो सकती।  

                जब सद्गुरु की कृपा होती है तभी हम ध्यान के द्वारा अंदर के ज्ञान दिव्य अनुभूतियों का अनुभव कर सकते है।  गुरु एक प्रवेश द्वार है।  गुरु हमारे अध्यत्म मार्ग की एक सीडी है।  गुरु हमें अँधेरे से उजाले की तरफ लेजा सकता है।  गुरु कृपा से काम, क्रोध, मध, लोभ, मोह, से छुटकारा मिलजाता है। हमारी  बुद्धि , हमारी चालाकी संसार को समझने में अधिक सछम है।  परन्तु अध्यात्म जगत में असफल है। 

                 आत्म ज्ञान गुरु कृपा की बिना नहीं होता इसके लिए सरल सुगम सहज होना अनवार्य है। चालक व्यक्ति हमेशा भविष्य उन्मुखी होता है। लोग कहते है कि सतरंज का खिलाडी वही चालक है , जो अगली पांच चलो को सोच कर चल सके।  ऐसा व्यक्ति आत्म रमण नहीं कर सकता और न ही स्वयं में स्थित हो सकता स्वयं  में स्थित होने के लिए गुरु का निर्देश एवं अनुशासन जरूरी है। 

                 पातंजल योग का पहला सूत्र है, अथ योगानुशाशनम यम , नियम आसन आदि के बिना अनुशाशन सम्भव नहीं है। गुरु कृपा से ही श्रुति एवं शुद्धी  मिलती है , बिना गुरु के मुक्ती नहीं मिलती है। 

                     कबीर दस जी ने  गुरु और गोविन्द की महिमा बताते हुए गुरु को ही बड़ा माना है क्यों कि गुरु कृपा से ही गोविन्द के दर्शन सम्भव है।  

                 गुरु गोविन्द दोनों खड़े काके लागू  पांय ,  बलिहारी गुरु आप ने  गोविन्द दिए बताए। 

इस प्रकार हम देखते है कि हमारे अध्यात्मक जीवन में  गुरु का बहुत बड़ा महत्व है। 


गुरु पूजा विधि --   

                               हमारे दैनिक जीवन में  सबसे पहली गुरु माता, पिता , बड़े भाई - बहन , शिछक होते है।  इन से आशीर्वाद लेकर वेद व्यास जी द्वारा रचे गग्रंथो का मनन करना चाहिए।  किसी पवित्र नदी में स्नान करना चाहिए। अगर अपने अपना कोई गुरु बनाया है तो उन के भी दर्शन करने चाहिए।   इस दिन पितृ तर्पण करके गरीबो को दान पुण्य करना चाहिए।



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