MANSUN

मानसून -- 

       मानसून शब्द की उतपत्ति अरबी भाषा के मौसिक शब्द से हुई है।  मासून का अर्थ है - पवनों की दिशा का मौसम के अनुसार बदल जाना।  भारत में अरब सागर तथा बंगाल की खाड़ी से चलने वाली हवाओं की दिशा में ऋतुवत परिवर्तन होता रहता है।  इसी सन्दर्भ में भारतीय जलवायु को मानसूनी जलवायु कहा जाता है मासून की उतपत्ति का स्पष्ट कारण अभी भी ज्ञात नहीं है। 19 वीं सदी के अन्त में इस संदर्भ में यह व्याख्या की गयी की गर्मी के समय में स्थल और समुद्र का अलग - अलग दर से गर्म होना ही मानसूनी पवनों के भारतीय उपमहाद्वीप की ओर चलने की पृष्टभूमि तैयार करता है। 

      अप्रैल और मई में जब सूर्य कर्क रेखा पर लंबवत चमकता है , तो हिन्द महासागर के उत्तर में स्थित विशाल भूखण्ड अत्यधिक गर्म हो जाता है।  

       गर्म होने के परिणामश्वरूप भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तर - पश्चिम भाग पर एक निमन वायुदाब क्षेत्र विकसित हो जाता है , जबकि भूखण्ड के दक्षिण में स्थित हिन्द महासागर अपेक्षित धीरे - धीरे गर्म होता है।  यह निमन वायुदाब केन्द्र विषुवत रेखा के पार से दक्षिण - पूर्वी समागी पवनों को आकर्षित कर लेता है।  

      इस दक्षिण - पूर्वी व्यापारिक पवनों की उत्तपति समुद्र से होती है।  हिन्द महासागर में विषुवत वृत्त को पर करके ये पवने बंगाल की खाड़ी तथा अरब सागर में पहुंच जाता है गर्म धाराओं के ऊपर से गुजरने के कारण ये भारी मात्रा में आद्रता ग्रहण कर लेती है। इस प्रकार दक्षिण - पश्चिमी मानसूनी पवनों को दक्षिण - पूर्वी पवनो के विस्तार के रूप में देखा जाता है , जो कि भूमध्य रेखा पार करके भारतीय उपमहाद्वीप की ओर मूड जाती है।  दक्षिण - पश्चिमी मानसून केवल तट पर एक जून के आस - पास पहुंचता है और शीध्र ही  10 - 18 जून के बीच यह मुंबई और कोलकता पहुँच जाता है।  

मानसून का  फटना -- 


         ये वर्षा वाहिनी पवनें होती है , जो तीव्र गति से चलती है।  इनकी औसत गति 30 किमी \ घण्टा। ये पवनें उत्तर - पश्चिम  दूरस्थ भागों को छोड़कर एक ही महीने के अंतर्गत सम्पूर्ण भारत में फेल जाती है।   पवनों के साथ ही बादलों का प्रचण्ड गर्जन तथा बिजली का चमकना सुरु हो जाता है , इसे ही मानसून का फटना अथवा मानसून प्रस्फोट भी कहा जाता है।  जुलाई माह के मध्य तक मनसूनी पवने सम्पूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप में फैल जाती है।  प्रायद्वीपीय स्थित  कारण दक्षिण - पश्चिमी मासून दो सखाओं - अरब सागर की साखा तथा बंगाल की खाड़ी  की साखा में बट जाता है।  

आरव सागरीय मानसून और बंगाल की कड़ी के मानसून  -- मानसून की बंगाल की खाड़ी की शाखा म्यंमार के तट की ओर तथा बांग्लादेश के दक्षिण - पूर्वी भागों  की ओर बढ़ती है , किन्तु म्यांमार तट पर फैले आराकान पर्वत से टकराकर भारतीय उपमहाद्वीप की ओर मुड जाती है , जिसके फलस्वरूप यह पूर्वोत्तर  भारी वर्षा।  

 चूँकि मानसूनी वर्षा के लिए पृष्ठ भूमि का निर्माण ग्रीष्म ऋतु में ही आरंम्भ , भारतीय भू-खण्ड में निमन वायुदाव तथा समुद्र में उच्च वायुदाव का निर्माण होता है , जो अत्यधिक वर्षा का कारण बनता है , इसलिए भारत  में अधिकांश वर्षा ग्रीष्मकाल अर्थात गर्मियों में ही होती है।  

अर्ब सागर शाखा द्वारा भारत  पश्चिमी तट , पश्चिमी घाट पर्वत , महाराष्ट्र , गुजरात एवं मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों में वर्षा होती है।  

मानसून का लौटना -- 

   
 अक्टूबर व् नबंबर के महीनों में भारत की मुख्य भूमि से मानसून लौटने लगता है।  इस स्थित में धरातलीय पवनों की दिशा विपरीत होने लगती है।  

ये स्थल से सागर की ओर प्रवाहित होती है। जब ये हवाएं बंगाल की खाड़ी के ऊपर से गुजरतीं है , तो आद्रता ग्रहण करने के कारण स्थलीय अवरोधों से टकराकर वर्षा करतीं है , इसी कारण तमिलनाडु में जाड़ों में वर्षा होती है।  भारत के कोरोमण्डल तट पर शीत ऋतु में लौटते हुए मानसून द्वारा भारी वर्षा होती है।  




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