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प्रथम विश्व युद्ध की घटनाएँ --  प्रथम विश्व युद्ध 28 जुलाई 1914 से प्रारम्भ होकर 11 नबंबर 1918 तक चला। इस महायुद्ध में यूरोप तथा विश्व के अन्य देशो ने भाग लिया। इस युद्ध में पहली बार बड़े पैमाने पर अस्त्र - शस्त्रों का प्रयोग किया गया , जिसके कारण मानव जाति का भयंकर विनाश हुआ। युद्ध में एक ओर जर्मनी , आस्ट्रिया , हंगरी तथा दूसरी ओर रूस , फ्रांस , इग्लेण्ड और सर्विया थे।  1914 की घटनाएँ --   प्रथम विश्व युद्ध की शुरुआत -- 28 जुलाई 1914 को आँस्ट्रिया ने सर्बिया के विरुद्ध युद्ध घोषणा कर दी।  20 अगस्त को जर्मनी ने बेल्जियम पर आक्रमण किया , जिसमे जर्मनी की जीत हुई।  जर्मनी का फ्रांस पर आक्रमण फ्रांसीसियों ने मार्न की लड़ाई में जर्मनी को हराकर उसे पीछे हटने पर मजबूत कर दिया।  रूस का प्रशा पर आक्रमण टेननबर्ग की लड़ाई में रूस की हार हुई।  ऑस्ट्रिया का पलैण्ड प्रदेशों पर आक्रमण ऑस्ट्रिया ने रूस के अधीन पोलेण्ड प्रदेशों पर आक्रमण किया , किन्तु उसे सफलता नहीं मिली।  मित्र राष्ट्रों रूस , फ्रांस , इग्लेण्ड , सर्बिया ने जर्मनी के ...
प्रथम विश्व युद्ध के कारण और परिणाम --  प्रथम विश्व युद्ध की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि -- विश्व के इतिहास में प्रथम विश्व युद्ध एक महत्वपूर्ण घटना मानी जाती है। यह 28 जुलाई 1914से आरम्भ होकर 11 नबंबर 1918 तक चला। यह अत्यन्त भीषण युद्ध था , जो मानवता के इतिहास में अत्यन्त विनाशकारी सिद्ध हुआ। यह युद्ध साम्राजयवादी शक्तियों के मध्य औपनिवेशिक बँटवारे को लेकर शुरू हुआ था। यह युद्ध विसवीं सदी के प्रारम्भिक वर्षों में विकसित सबसे शक्तिशाली एवं संघटित राष्ट्रों के मध्य लड़ा गया था। इस युद्ध ने एशिया और अफ्रीका में राज्यवादी आन्दोलन को तेज कर दिया था। इस युद्ध के परिणाम जहाँ मानवता - विरोधी थे , वहीं मानव कल्याण का मार्ग भी इस युद्ध ने प्रशस्त किया सदियों की वैज्ञानिक प्रगति का नकारात्मक पक्ष इस युद्ध में अधिक स्पष्ट हुआ। युद्ध के पश्चात पुनर्निर्माण के माध्यम से पुनः वैज्ञानिक प्रगति का मार्ग खुला। प्रथम विश्व युद्ध के कारण -- उग्र राष्ट्रीयता की भावना का विकास -- राष्ट्रवाद के उदय के कारण यूरोप में उग्र राष्ट्रीयता की भावनाएँ प्रवल हो चुकी थी , जिससे अनेक राष्ट्रों के मध्य उतपन्न...
राज्यसभा की शक्तियाँ अथवा कार्य -- विधायी शक्तियाँ -- साधारण विधेयक किसी भी सदन में आरम्भ किए जा सकते है। दोनों सदनों से पारित विधेयक राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए भेजा जाता है। दोनों सदनों में गतिरोध उतपन्न होने पर राष्ट्रपति संयुक्त बैठक बुला सकते है , लेकिन व्यवहार में लोकसभा की सदस्य संख्या अधिक होने के कारण वह विधेयक पारित करा लेती है। राज्यसभा ऐसे विधेयकों को कानून बनाने से नहीं रोक सकती , किन्तु उन्हें ज्यादा - से - ज्यादा 6 माह तक रोक सकती है। वित्तीय शक्तियाँ -- धन विधेयक पर राज्यसभा की शक्ति केवल विलंबकारी व् नाममात्र की है। धन विधेयक केवल लोकसभा में पेश किया जा सकता है। लोकसभा से पारित होने के बाद धन विधेयक राज्यसभा में पेश किया जाता है। राज्यसभा 14 दिनों के अन्दर अपने विचार तथा सहमति अथवा असहमति संबन्धी संस्तुति के साथ इसे लोकसभा में भेजती है। राज्यसभा इसे केवल 14 दिन तक रोक सकती है। इसके उपरान्त इसे राज्यसभा के असहमत होने पर भी पारित समझा जाता है। प्रशासकीय शक्तियाँ -- राज्यसभा की प्रशासकीय शक्तियाँ भी नाममात्र की है , हालाँकि मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति उत्तरदाय...
लोकसभा की शक्तियाँ अथवा कार्य -- विधायी शक्तियाँ -- साधारणतया किसी भी विधेयक को धन विधेयक को छोड़कर संसद के किसी भी सदन में प्रस्तावित किया जा सकता है , लगभग सभी महत्वपूर्ण विधेयक पहले लोकसभा में प्रस्तुत किए जाते है। लोकसभा की अनुमति क बिना कोई भी कानून पास नहीं हो सकता है। गतिरोध उतपन्न होने पर राष्ट्रपति द्वारा संयुक्त बैठक बुलाई जाती है। राज्यसभा से अधिक सदस्य संख्या होने के कारण लोकसभा संयुक्त बैठक में विधेयक को पास करने में विजयी रहती है। लोकसभा की शक्तियाँ राज्यसभा से अधिक प्रभावी होती है।  वित्तीय शक्तियाँ -- धन / वित्त पर वास्तविक नियंत्रण लोकसभा का होता है। बजट के संबंध में तथा धन / वित्त विधेयक के संबन्ध में लगभग समस्त शक्तियाँ लोकसभा को ही प्रदान की गई है। बजट एवं धन विधेयक सर्वप्रथम लोकसभा में ही प्रस्तुत किए जाते है। लोकसभा में पारित होने के बाद ही धन विधेयक व् बजट को राज्यसभा में भेजा जाता है।  राज्यसभा को 14 दिन के अन्दर ऐसे विधेयकों को अपनी सिफारिश/ सुझाव सहित वापस करना पड़ता है। यदि राज्यसभा इनको 14 दिन के अन्दर वापस न करे तो लोकसभा विधेयकों ...
विनिमय के लाभ या महत्व -- श्रम का विशिष्टीकरण -- किसी विशिष्ट वस्तु का विनिमय उस वस्तु के वृहत उत्पादन को बढ़ावा देता है। इससे उस वस्तु के उत्पादन में लगे हुए श्रमिक उसके उत्पादन में विशेषता प्राप्त कर लेते है। इस तरह विनिमय से श्रम का विशिष्टीकरण हो जाता है। कौशल विकास -- जब श्रमिकों द्वारा एक ही कार्य बार - बार किया जाता है , तो वह इस कार्य में निपुण हो जाते है। अतः श्रम विभाजन के अन्तर्गत श्रमिकों  कुशलता में वृद्धि होती है। संयुक्त लाभ -- विनिमय प्रक्रिया द्वारा व्यक्तियों या राष्ट्रों को कम महत्व वाली वस्तुओं के बदले अधिक महत्व वाली वस्तुएँ प्राप्त होती है। इस प्रकार विनिमय के दोनों पक्षों को लाभ होता है। विस्तृत बाजार पहुँच -- विनिमय ने बाजारों के क्षेत्र को अधिक बढ़ा दिया है। पहले बाजार एक ही स्थान पर होते थे , किन्तु अब बाजार प्रान्तीय , राष्ट्र्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीयय हो गए है। वृहत उत्पादन लाभ -- वर्तमान में वस्तुओं का उत्पादन बड़े स्तर पर होता है तथा इनका बाजार में विक्रय किया जाता है। अतः विनिमय के आभाव में यह सम्भव नहीं था। सन्तुष्टि में वृद्धि -- विनि...
मुद्रा विनिमय या अप्रत्यक्ष विनिमय या  क्रय - विक्रय प्रणाली -- वस्तु विनिमय प्रणाली के अन्तर्गत उतपन्न समस्याओं के समाधान के लिए ऐसी वस्तु की आवश्यकता प्रतीत हुई , जिसके द्वारा इस समस्या का समाधान हो सके। इसी  आवश्यकता के क्रम में मुद्रा का जन्म हुआ।   हेन्सन के अनुसार मुद्रा का जन्म वस्तु विनिमय की कठिनाई से संबन्धित है। जब किसी भी विनिमय प्रणाली में मुद्रा विनिमय की भूमिका निभाने लगती है या मुद्रा विनिमय का माध्यम बन जाती है , तो वह प्रणाली मुद्रा विनिमय प्रणाली कहलाती है। दूसरे शब्दों में खा जाए तो वस्तुओं एवं सेवाओं के क्रय - विक्रय या आदान - प्रदान के लिए जब मुद्रा की सहायता की जाती है या उसका उपयोग किया जाता है ,तो वह प्रणाली मुद्रा विनिमय प्रणाली या क्रय - विक्रय प्रणाली कहलाती है। मुद्रा विनिमय प्रणाली के गुड़ --  वस्तु विनिमय प्रणाली की समस्याओं का निराकरण -- वस्तु विनिमय प्रणाली से उतपन्न समस्याओं को दूर करने के लिए मुद्रा विनिमय प्रणाली का विकास  किया गया। वस्तुओं की विभाजयता -- मुद्रा विनिमय प्रणाली से वस्तुओं की विभाजयता या छोटे - छो...
वस्तु विनिमय प्रणाली की कठिनाइयाँ -- वस्तु के विभाजन की कठिनाई -- कुछ वस्तुओं का हम विभाजन नहीं कर सकते है , विभाजन करने से उनकी उपयोगिता खत्म हो जाती है जैसे - टी वी हाथी , कार आदि। अतः विनिमय प्रणाली में वस्तुओं की अविभाजित भी बड़ा कारण बनती है तथा इन वस्तुओं के बदले में उनके स्वामी को उचित मूल्य प्राप्त नहीं होता है। हस्तान्तर की असुविधा -- विनिमय प्रणाली के द्वारा बहुत सी वस्तुओं को हस्तान्तरित करने में समस्या उतपन्न होती है। जैसे - भवन ,, भूमि ,पशु , बड़ी वस्तु आदि। इस क्रिया में श्रम , धन तथा समय का अपव्यय भी होता है। वैकल्पिक आवश्यकता का आभाव -- दोहरे संयोग का आभाव विनिमय प्रणाली की सबसे बड़ी समस्या है। इसमें एक व्यक्ति को ऐसे दूसरे व्यक्ति की तलाश करनी पड़ती है , जिसके पास उसकी आवश्यकता की वस्तु हो और वह व्यक्ति अपनी वस्तु के बदले में स्वयं उस मनुष्य की वस्तु लेने को ततपर हो। इस प्रकार दो पक्षों का ऐसा पारस्परिक संयोग मिलना कठिन होता है। मूल्य के सर्वमान्य माप का आभाव -- विनिमय प्रणाली की एक अन्य समस्या मूल्य के सर्वमान्य माप का आभाव है। इसके अन्तर्गत मूल्य का कोई ऐस...